मां तू पहले जैसी नहीं रही!

कृष्णा द्विवेदी
मातृत्व ही स्त्रीत्व को सम्पूर्ण बनाता है वरना उसके जीवन पर बांझ, निःसन्तान, निपूती, करमजली और न जाने कितने सामाजिक शापित अलंकरण चस्पा कर दिए जाते हैं। जीवन कठिन हो जाता है और जीना दुस्वार। प्रसव वेदना स्त्री के जीवन का सर्वाधिक पीड़ा वाला क्षण होता है, आंखों में आँसू पर होठों पर मुस्कान के साथ असीम पीड़ा झेलकर, जीवन दांव पर लगाकर किसी कुल को उसका वारिस देने का महत्वपूर्ण कार्य सिर्फ स्त्री ही कर सकती है। इसके पहले वह सबकुछ थी मगर मां नहीं थी। आज वह मां बनी सम्पूर्ण बनी।
मानव जाति के अलावा अंडज हों या पिंडज, मां की भूमिका में कोई परिवर्तन नहीं होता है। हाँ, फर्क इतना है कि वहां कोई आशा नहीं, कोई स्वार्थ नहीं, सीधा-साधा हिसाब, नदी पार किया नाव छोड़ दिया, कोई मोह-माया नहीं, पीछे मुड़कर नहीं देखना। अपनी चाह अपनी राह। किंतु मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है, वह अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य से भी जुड़ा है। यहां हम मानवीय मां की बात कर रहे हैं।
सांसारिक और पारिवारिक रिश्ते उम्र, समय और आवश्यकता के अनुरूप बदलते एहते हैं। माँ का ही एकमात्र ऐसा रिश्ता है जो निरन्तर शास्वत है। माली पौधों को खाद-पानी देता है। उसको वो पौधे अपने बच्चों जैसे प्यारे लगने लगते हैं फिर जिस मां ने अपने बच्चों को अपने रुधिर मांस से सींचा हो भला वह उसके लिए कैसे बदल जाएगी। हमारी आवश्यकताएं बिना बताए सिर्फ मां ही जान सकती है। हजारों मील दूर बैठी माँ ही है जो अपने बच्चों पर आई हुई या आने वाली मुसीबत का बखूबी अहसास कर लेती है। पहाड़ जैसे दु:ख को भी अपने सीने में मां इसलिए दफन किये रहती है कि उसके बच्चों को दु:ख न पहुंचे। साहस, त्याग और सेवा की चलती-फिरती साक्षात मूर्ति सिर्फ मां ही होती है। अनपढ़ होते हुए भी उच्चकोटि के गुरु की सभी योग्यतायें माँ के अंदर ही समाहित होती हैं। औलाद कैसी भी हो, एक माँ ही है जिसको अपने बच्चों में कोई खोट या कमी कभी नज़र नहीं आती है।
बच्चों के जीवन, सुख-स्वास्थ्य और सफल गृहस्थी के वास्ते माँ अपना सबकुछ खुशी-खुशी इसी परिवार पर लुटा देती है। आपको सुखी और सन्तुष्ट देखकर संसार में सबसे ज्यादा खुशी जिस चेहरे से टपकती है, वह माँ ही है। हाँ, समय-समय पर कुछ माएँ भी इस कसौटी पर खरी नहीं उतरी हैं पर उनकी संख्या नगण्य है। उनके कर्मों से सम्पूर्ण मातृत्व पर उंगली नहीं उठाई जा सकती है, कुंती हों या मन्थरा, कुछ तो मजबूरियां उनकी भी रही होंगी।
आज कुछ बच्चों को शिकायत है कि उनकी माँ पहले जैसी नहीं रही, कुछ बदल-सी गई है पर वास्तव में ऐसा नहीं है। सोच, दृष्टि, आवश्यकताएं और प्राथमिकताएं हमारी बदल सकती हैं, माँ की नहीं। वह माँ के अलावा और भी कई सम्बोधन लिए पूरी जिंदगी फिरती है। वह भी बेटी, बहन, पत्नी, बहू, भाभी, चाची, ताई इत्यादि सामाजिक और पारिवारिक रिश्तों को बखूबी निभाती है। वह भी एक इंसान ही है, अन्य किसी भी रिश्ते को निभाने में उससे गलती हो सकती है परन्तु जब वह मातृत्व की कुर्सी पर बैठी होती है तब वह गलत नहीं हो सकती है। घर-परिवार से दूर वृद्धाश्रम में रहने वाली मां भी दिन-रात अपने उसी परिवार की सलामती की दुआ करती रहती है जिसने उसको वहाँ पहुंचाया होता है। वह सारी उम्र इस आशा में जीती है कि बच्चों के बड़े हो जाने पर उसका सारा दु:ख-दलिद्दर दूर हो जाएगा पर ऐसा न होने पर भी वह अपनी किस्मत को दोष दे सकती है औलाद को नहीं।
माँ को बुढ़ापे में चाहिए ही क्या होता है, एक छोटी-सी कोठरी या चारपाई की जगह। एक छोटी-सी सन्दूक जो उसको अपनी शादी में मिली थी, जिसमे उसकी जिंदगी से जुड़ी कुछ चीजें वस्तुएं होती हैं, उसको भी सुरक्षित रखने की थोड़ी-सी जगह, समय पर रोटी, दवाई, बच्चों से सम्मान और नाती-पोतों का प्यार-दुलार। बस और क्या, वह इतने में अपने आपको दुनियां की सबसे सुखी औरत मान लेती है। अपनी पूरी जिंदगी की सेवा, त्याग, तपस्या के बदले उसको यही चाहिए, बस यही।
लेकिन जब हम इतना भी नहीं दे पाते हैं तब कहते हैं कि माँ अब बदल गई, पहले जैसी नहीं रही। भाई जैसे जल अपनी शीतलता, वायु अपनी निरन्तरता और धरा अपनी सहनशक्ति नहीं छोड़ती हैं, जैसे सूरज चंदा के उगने और अस्त होने में कोई बदलाव नहीं आता है, वैसे ही मां के प्रेम, स्नेह, प्यार, दुलार और ममतामयी आशीष में कभी बदलाव नहीं आता है। अगर पहले जैसे नहीं हैं तो हम, वह जैसे पहले थी ठीक वैसे अब भी है, हमें अपनी सोच और दृष्टि बदलनी होगी। दुनियां की सभी माँओं को प्रणाम!
(लेखक चिंतक व समाजसेवी हैं।)

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