डॉ. हरि किशोर प्रसाद सिंह
वैशाली। सरैया प्रखण्डान्तर्गत भगवान महावीर की जन्मस्थली बासोकुंड स्थित प्राकृत जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान, बसोकुंड, मुजफ्फरपुर अपनी परम्परागत विरासत सहेजने में नाकाम साबित हो रहा है। अप्रैल, 1956 की 23 तारीख को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने यहां मंदिर की नींव डाली थी। उसके बाद मंदिर से 200 मीटर पहले प्राकृत जैन शास्त्र और अहिंसा शोध संस्थान की आधारशीला रखी थी। उस अवसर पर उन्होंने संस्थान के लिए चयनित जगह पर निर्मित सभा मंच से ही लोगों को सम्बोधित किया था और इसके बाद संस्थान के भव्य भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया था।
इससे पहले अस्थायी भवन में मुजफ्फरपुर शहर के हरिसभा चौक स्थित किराये के मकान में संस्थान विधिवत चल रहा था। पी.एच.डी. के साथ-साथ प्राकृत और जैन शास्त्र विषय में एम. ए. का पठन-पाठन भी सुचारू ढंग से प्रारंभ हो गया था। सन 1965 ई. में बासोकुंड में संस्थान का भव्य भवन बनकर तैयार हो जाने पर हरिसभा चौक से बासोकुंड स्थानान्तरित कर दिया गया, जहाँ प्राकृत और जैन शास्त्र में एम.ए. और पी-एच.डी. की पढ़ाई होने लगी। साथ ही कुछ वर्षों के लिए सेतु पाठयक्रम भी शुरू किया गया था।
देश के इकलौते इस सरकारी संस्थान का कभी अपना स्वर्णिम इतिहास रहा था। इस संस्थान के पठन-पाठन करने वाले आधा दर्जन से अधिक अध्येताओं को महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया था। लेकिन सरकारी उदासीनता के फलस्वरूप तत्काल संस्थान में तालेबंदी की स्थिति बनी हुई है और सरकारी उदासीनता एवं उपेक्षापूर्ण रवैये के फलस्वरूप यहाँ की पढ़ाई अब ठप हो चुकी है। आज की तारीख में संस्थान में न एक भी नामांकन है और न ही कोई पढ़ाने के लिए व्याख्याता ही है। संस्थान में तत्काल दो किरानी, दो चपरासी, एक कम्प्युटर ऑपरेटर, एक रात्रि प्रहरी और एक सफाईकर्मी कार्यरत हैं।
1 दिसम्बर 1955 को यह संस्थान प्रारंभ हुआ था। प्रथम निदेशक डॉ. हीरा लाल जैन थे। डॉ. जैन के पश्चात निदेशक पद को सुशोभित करने वाले विद्वानों में डॉ. गुलाबचन्द्र चौधरी, डॉ. नागेन्द्र प्रसाद, डॉ. राम प्रकाश पोद्दार, प्रो. नन्द किशोर सिंह, डॉ. देवनारायण शर्मा, डॉ. लालचन्द्र जैन, डॉ. युगल किशोर मिश्र, प्रो. शिव कुमार मिश्र, डॉ. सुभाष चन्द्र जैन एवं डॉ. मंजुबाला के सेवा निवृति के पश्चात संस्थान का शैक्षणिक वातावरण लगता है प्रायः अंधकारमय हो चुका है, क्योंकि संस्थान में एक भी व्याख्याता पदस्थापित नहीं हैं।

संस्थान की जब अपनी गरिमा थी :
एक समय था जब डॉ. राम प्रकाश पोद्वार एवं डॉ. देव नारायण शर्मा जैसे संस्थान के निदेशक थे तो संस्थान का वातावरण शैक्षणिक था। संस्थान के छात्रावास में अध्येतागण नियमित रूप से निवास करते थे। राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त और 26 जनवरी संस्थान और छात्रावास में सोल्लासपूर्ण वातावरण में मनाया जाता था। देश ही नहीं विदेश यथा फ्राँस, श्रीलंका, जापान आदि के छात्र अध्ययनरत थे। संस्थान की अपनी एक गरिमा थी।

राष्ट्रपति ने किया था सम्मानित :
संस्थान के सेवानिवृत निदेशक डॉ. सुभाषचन्द्र जैन ने ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ संवाददाता को बताया कि यहाँ के अध्येता रहे डॉ. प्रेम सुमन जैन, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र, प्रो. (डॉ) रामजी राय, प्रो. विश्वनाथ चौधरी, डॉ. डी.पी. श्रीवास्तव, डॉ. सुदर्शन मिश्र, प्रो. गोकुल चन्द्र जैन, प्रो. उदयचन्द्र जैन, रंजन सूर्यदेव आदि विद्वानों ने यहां से एम.ए. करने के बाद पी-एच.डी. की डिग्री ली थी और उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मान किया गया था। रंजन सूर्यदेव को तो बिरला सम्मान भी प्राप्त हुआ था।
संस्थान का विशाल समृद्ध पुस्तकालय है :
संस्थान से अब तक लगभग 80 छात्रों को पी-एच.डी., दो को तो डिलिट् और 300 से अधिक ने एम. ए. की पढ़ाई पूरी की है। जिसमें राष्ट्र के सभी स्थानों के लोग शामिल हैं। संस्थान का अपना विशाल समृद्ध पुस्तकालय भी है, जहाँ हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, प्राकृत, गुजराती, मराठी, कन्नड़, उड़िया, बंगला भाषाओं की 18000 से अधिक पुस्तकें आज भी सुरक्षित हैं। इनमें 50 प्रतिशत से अधिक पुस्तकें दुर्लभ हैं जो शायद ही किसी पुस्तकालय में उपलब्ध होंगी।
राजभवन भी नहीं सुन रहा फरियाद :
डॉ. सुभाष चन्द्र जैन ने इस संवाददाता को बताया कि पुस्तकालय की सम्पति की रक्षा एवं यहाँ कि पुस्तकों को डिजिटलाइजेशन करवाने हेतु मैंने राजभवन को अनेको बार पत्र लिखकर अपनी फरियाद कर चुका हूं। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।


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