राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। एक तरफ लोग महंगाई से जूझ रहे हैं, दूसरी तरफ Bonn जैसी नामी ब्रेड कंपनी उपभोक्ताओं की सेहत से खिलवाड़ करने में लगी है। ताजा मामला शहर की गरिमा मिश्रा का है, जिन्होंने बाजार से Bonn कंपनी के दो पैकेट बन्स खरीदे। पैकेट पर 24 अप्रैल 2025 की एक्सपायरी डेट दर्ज थी, यानी चार दिन बाकी थे, लेकिन घर पहुंचते ही जब बन्स खोलकर देखा तो उनकी दुर्गंध और सख्त बनावट ने हक्का-बक्का कर दिया। साफ था कि बन्स पूरी तरह बासी और सेहत के लिए हानिकारक थे।
Bonn कंपनी के बन्स में उपभोक्ताओं ने कई चौंकाने वाली खामियां पाई हैं, जो न केवल गुणवत्ता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक हैं। पहली और सबसे बड़ी खामी थी कि बन्स पूरी तरह बासी थे। दूसरी, कुछ बन्स ओवर बेक्ड थे – यानी जले हुए, जबकि कुछ पूरी तरह कच्चे और अधपके थे। तीसरी, शक की बड़ी वजह यह भी रही कि पुराने और खराब बन्स को नई पैकिंग में सील कर फिर से बाजार में उतारा गया था। और चौथी, एक ही पैकेट में बन्स का साइज अलग-अलग था – कोई छोटा, कोई बड़ा – जो साफ दर्शाता है कि प्रोडक्शन में कोई स्टैंडर्ड या क्वालिटी कंट्रोल नहीं है। ये साबित करता है कि कंपनी लागत घटाने के चक्कर में ग्राहकों की जान के साथ खिलवाड़ कर रही है।
इस मामले पर जवाब मांगने के लिए Bonn कंपनी के जोनल हेड अनिल रिखी से संपर्क किया गया, तो उन्होंने बेहद बेपरवाह अंदाज़ में कहा, “छाप लीजिए खबर, कुछ नहीं होगा।” उनके इस बयान ने साफ कर दिया कि कंपनी के अधिकारी खुद को कानून और उपभोक्ता अधिकारों से ऊपर समझते हैं। जबकि कंपनी के डिपो हेड आशीष चौहान ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, “मैं थोड़े ही बनाता हूं बन्स।” उनके इस बयान से स्पष्ट है कि Bonn कंपनी में जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं है और कोई भी व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता।
इस मामले पर स्थानीय डीलर देवेंद्र से सवाल किया गया, तो उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया, “ऐसा तो होता ही रहता है।” यह बयान न केवल उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम का मज़ाक उड़ाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि इस पूरे नेटवर्क में लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैया किस हद तक व्याप्त है।
फिलहाल, सबसे गंभीर बात यह है कि ये बासी बन्स ज्यादातर बच्चों के लंच बॉक्स में जाते हैं। ऐसे बन्स से फूड पॉइज़निंग, पेट दर्द, उल्टी-दस्त जैसी बीमारियों का खतरा रहता है। Bonn जैसे ब्रांड से उपभोक्ता गुणवत्ता की उम्मीद रखते हैं, लेकिन जब वही ब्रांड जान-बूझकर बासी उत्पाद परोसता है तो यह सीधा-सीधा कानून और मानवता दोनों का उल्लंघन है।

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