वैवाहिक पावनता का गिरता स्तर

सामाजिक लेख : शरद चन्द्र
हमारी संस्कृति, सामाजिक परंपरायें जो तीन दशक पूर्व थीं, उसमें लगातार गिरावट देखी जा रही है। विवाह जिसे सामाजिक और पारिवारिक संस्था माना जाता है। रिश्ते में परिवार यहां तक की नाई और ब्राह्मण की अहम भूमिका होती थी। दो परिवारों के संबंध में सामाजिक संतुलन था। समाज का सम्मान और व्यक्तिगत आचरण दोनों का पालन अनिवार्य था।
पुराने विवाह परिवार की स्वीकृति, समाज की अपेक्षाएं और आर्थिक स्थिरता पर आधारित थे। स्त्री पुरुष की भूमिकाएं पारंपरिक अनुशासन में बंधी थी। लेकिन आज विवाह व्यक्तिगत खुशी, भावनात्मक संबंध और समान साझेदारी पर आधारित हो चला है। विवाह में देरी और उम्र का निकलता जाना संतानोत्पत्ति और वंश वृद्धि में बाधक बनता जा रहा है।
तब सब कुछ नया और अनजाना, नये लोग, नये रिश्ते, मन में उत्सुकता, हर दृश्य, हर मुस्कान, हर शब्द पहली बार का एहसास दिलाता था। हर रिश्ता, बातचीत नई दुनिया की तरह लगता था। अनजानापन मन को सजग रखते हुए यादों को गहराई देता था। यह अनजानापन जीवन में हर समय कुछ नया करना सिखाता था। बस हमें उसमें उतरना और अनुभव करना होता था।
आज के समय में विवाह केवल सामाजिक बंधन नहीं रह गया। यह व्यक्तिगत खुशी, भावनात्मक जुड़ाव, समान साझेदारी और आत्म संतोष का प्रतीक बन गया है। अपने जीवन साथी के चयन की स्वतंत्रता, उम्र, आर्थिक स्थिति, शिक्षा जैसी व्यक्तिगत प्राथमिकताएं अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं। अब विवाह में पाश्चात्य सभ्यता की झलक, दम्पति का सह-आर्थिक योगदान, दोनों के निर्णय, अपनी अपनी आजादी अब परिवार और समाज के लिए नहीं बल्कि दो के बीच आपसी समझ पर आधारित हो गई है।
महत्वाकांक्षा से रिश्ते टूट रहे हैं :
आधुनिक समय में वैवाहिक रिश्तों में चुनौतियां पहले से अधिक हो गई हैं। अब आरंभिक तीव्र आकर्षण शीघ्र ही अरुचि में बदल जाता है। लिव इन रिलेशनशिप में रहने के बावजूद भी रिश्तों को गहरा होने का समय नहीं दे पाते। व्यस्तता, तेज गति से भरी जीवनशैली, महत्वाकांक्षा से रिश्ते टूट रहे हैं। दोनों में सहनशीलता कम होती जा रही है, जिसके कारण संबंध विच्छेद तुरंत हो जा रहे हैं। पहले परिवार में अपनी समस्याओं को बताया जाता था। परिवार और समाज के लोग समाधान निकाल लेते थे।
और तलाक इसकी अंतिम परिणति है :
अब स्वतंत्रता तो है पर अपेक्षाएं भावात्मक जुड़ाव में बाधक हैं। जब उम्मीदें पूरी नहीं हो पाती तो असंतोष प्रेम के आकर्षण का क्षरण कर दे रहा है। अब तकनीकी संवाद तो है पर दिल से संवाद का समय घटा दिया है। खुलकर कहना, धैर्य से सुनना जैसी मजबूती पीछे छूट जा रही है और तलाक इसकी अंतिम परिणति है।
तभी अपना रोमांच बनाए रख सकता है :
आधुनिक युग में रिश्तों में दूरी शीघ्र बन जा रही है, मैं मेरा, तुम तुम्हारा बीच का रोड़ा। आज पति पत्नी दोनों आर्थिक और मानसिक रूप से सक्षम हैं। जब दंपति यह समझ लें कि मतभेद स्वाभाविक है और प्रेम का अर्थ मिलकर सुलझाना है, तभी विवाह अपना रोमांच बनाए रख सकता है।

(लेखक समाज कल्याण फेडरेशन ऑफ इंडिया के वरिष्ठ सदस्य हैं।)

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