हाथरस की निर्भया: रात के अंधेरे में सबूत खाक

जितेन्द्र बच्चन
दिल्ली के निर्भया के दरिन्दों को इसी साल जब 20 मार्च को फांसी दी गई थी, तब लगा था कि देश में अब इस तरह की दूसरी कोई घटना नहीं होगी। इससे पहले दुष्कर्म और छेड़छाड़ से जुड़े कानून में भी संशोधन कर के उन्हें और सख्त किए गए। कानून का पालन कराने वालों को भी तमाम अधिकारों से लैश किया गया। केन्द्र सरकार ने ताल ठोककर कहा- अब महिलाओं की इज्जत से कोई नहीं खेल पाएगा। किसी ने बुरी नजर डाली, तब भी वह कानून के शिकंजे में होगा। लेकिन औरतों को जरखरीद गुलाम समझने वालों के हौसले पस्त नहीं हुए। सरकार, अदालत और कानून की सारी कवायद धरी की धरी रह गई। अपराधी लगातार गुनाह कर रहे हैं। देश के कई हिस्सों में अब तक तमाम बहू-बेटियों को ये दरिन्दे बरबाद कर चुके हैं। ऐसी कई लड़कियां निर्भया बन चुकी हैं, जिनकी दास्तान सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ताजा मामला हाथरस की बेटी का है।
14 सितम्बर, 2020 को उत्तर प्रदेश के हाथरस में चार दरिन्दों ने एक दलित की बेटी पर कहर ढा दिया। उसके साथ ज्यादती की। उसके बाद उसका मुंह बंद करने के लिए क्रूरता का जो परिचय दिया, उसे जान-सुनकर कलेजा मुंह को आ लगता है। माता-पिता रुंधे गले से बताते हैं- पहले बेटी का गला दबाकर एकदम से मार डालने की कोशिश की। बेटी की जीभ काट दी। रीढ़ की हड्डी तोड़ दी। हाथ-पैर नाकाम कर दिए। पुलिस को सूचना दी तो पहले सामूहिक दुष्कर्म की रिपोर्ट लिखने से मना कर दिया। तहरीर लेकर पीडि़ता को अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कालेज व अस्पताल में भर्ती करा दिया। पीडि़ता के परिजनों को पुलिस लगातार टहलाती रही। क्योंकि बात अगड़ों और पिछड़ों की जाति से जुड़ी थी। दबंग हमेशा हावी होते हैं। यहां भी यही हुआ। बेटी की हालत और खराब होने लगी तो मामला मीडिया तक पहुंचा। उसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और एक-एक कर के चारों आरोपितों- संदीप, रामू, लवकुश और रवि को गिरफ्तार कर लिया। पीडि़ता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल भेजा गया। वहां घटना के 14 दिन बाद 29 सितम्बर को हाथरस की 19 वर्षीया इस निर्भया ने दम तोड़ दिया।
लेकिन पुलिस इसके बावजूद यही कहती रही कि पीडि़त लडक़ी की जीभ नहीं काटी गई। उसकी रीढ़ की हड्डी नहीं तोड़ी गई। उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म भी नहीं हुआ। लेकिन तब तक बात बहुत आगे निकल चुकी थी। हाथरस की इस बेटी की मौत होते ही देश के तमाम शहरों में घिनौने अपराध के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी। पडि़ता के परिजन छाती-कपार पीटते हुए देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ों पर मातम करने लगे। भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर ने बात की और इस दरिन्दगी के विरोध में नारा बुलंद करना शुरू कर दिया- महिलाओं पर अत्याचार बंद करो। दोषियों को फांसी दो! यह हुंकार सुनते ही उत्तर प्रदेश पुलिस बौखला गई। उसने सोचा कहीं यह मामला तूल न पकड़ ले। उससे पहले ही पीडि़ता का शव रात के अंधेरे में हाथरस ले आई और गांव में ही बिना परिजनों की सहमती के जला दिया। सारे सुबूत खाक हो गए।
यह पुलिस की ज्यादती थी। पहले हाथरस के गुंडों ने कहर ढाया, उसके बाद पुलिस ने अंग्रेजों के जमाने जैसी मनमानी की। कानून के रखवालों ने ही कानून की धज्जियां उड़ा दीं। लडक़ी के माता-पिता, भाई या कोई नाते-रिश्तेदार शव-दाह के समय मौजूद नहीं था। मीडिया ने सवाल उठाए तो सरकार जागी। पहले पुलिस के एडीजी प्रशांत कुमार ने उल्टे-सीधे बयान दिए। तब भी मामला तूल पकड़ता गया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की। योगी सरकार ने दूसरे ही दिन इस घटना की निंदा करते हुए 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद और परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का एलान कर दिया। लेकिन लडक़ी की मां ने साफ कह दिया- हमें दोषियों की फांसी से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।
हैरानी इस बात की है कि पुलिस इस बीच लगातार अपने को पाक-साफ बताते हुए यही कहती रही कि पीडि़ता के साथ सामूहिक दुष्कर्म नहीं हुआ है। साथ ही सुबूत के तौर पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी दिखाई। लेकिन परिजनों का कहना है कि सब दंबगों से मिले हुए हैं। इस बीच कई राजनीतिज्ञ भी इस मामले में अपनी-अपनी रोटियां सेकने के लिए कूद पड़े। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गंाधी, राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका वाड्रा और आप नेताओं ने बयान देने शुरू कर दिए। कुछेक ने हाथरस कूच करने का एलान कर दिया। पीडि़ता के गांव को पुलिस ने छावनी में तब्दील कर दिया। यहां तक कि मीडिया पर भी पहरा लगा दिया गया। तब भी पीडि़त परिवार की आवाज छन-छनकर मुखर होती रही तो उत्तर प्रदेश सरकार ने मदद की धनराशि दस लाख से बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दी। खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने घटना पर अफसोस जताते हुए लडक़ी के पिता से फोन पर बात की और मामले की जांच-पड़ताल के लिए एसआईटी टीम का गठन कर दिया। मुकदमे की सुनवाई त्वरित अदालत में कराने का आश्वासन देते हुए एसआईटी को दिशा-निर्देश दिया कि एक सप्ताह के अंदर जांच रिपोर्ट सामने होनी चाहिए।
अदालत में आज नहीं तो कल इस मामले का फैसला होगा। दोषियों को सजा भी मिलेगी, इसमें कोई संदेह नहीं लेकिन उन अधिकारियों को क्यों बचाया जा रहा है जिन्होंने रात के अंधेरे में सारे सबूत खाक कर दिए? एक बेटी की न अर्थी सजी और न ही चिता जलाने से पहले उसका हिन्दू धर्म के अनुसार अंतिम दाह-संस्कार करने दिया गया? आखिर ऐसा कौन पाप था कि उसे छिपाने के लिए मीडिया तक को गांव में नहीं जाने दिया गया? यह तो अन्याय है योगी जी। पुलिस की करतूतों पर अगर आपकी सरकार ने पर्दा डाला तो निश्चित ही यह मामला आपकी सरकार के गले की हड्डी बन सकता है।
(लेखक पत्रकार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।)

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