नई दिल्ली। लाहुल के बाशिंदों को आज असल आजादी मिल गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को अटल टनल देश को समर्पित कर दिया। यह सुरंग लाहुल के लोगों सहित सेना को भी बल देगी। सेना की लेह लद्दाख में सीमा तक पहुंच आसान होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना काल के बीच हिमाचल में एक साथ तीन कार्यक्रमों में संबोधन किया। अटल टनल के साउथ पोर्टल में अधिकारियों को संबोधित किया। इसके बाद सिस्सू और सोलंग में दो जनसभाएं की। पीएम मोदी ने कृषि संबंधी सुधारों पर हो रहे विरोध पर भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कांग्रेस भी सुधार करना चाहती थी, लेकिन वोट बैंक की राजनीति से डरती थी। यह सुधार किसानों के हित में हैं।
पीएम मोदी ने पूर्व कांग्रेस सरकारों को सेना की अनदेखी पर भी कोसा। मोदी ने कहा वायुसेना आधुनिक लड़ाकू विमान मांगती रही, लेकिन फाइल पर फाइल खोली गई। आयुध डिपो पर ध्यान नहीं दिया गया। तेजस को डिब्बे में बंद करने के प्रयास किए गए। सीडीएस से बेहतर समन्वय बना है। मोदी ने कहा सेना के लिए देश में हथियार बनेंगे। भारतीय संस्थानों को बढ़ावा दिया गया है व कई विदेशी कंपनियों को वैन किया गया।
प्रधानमंत्री साउथ पोर्टल से नार्थ पोर्टल के लिए खुली जिप्सी में रवाना हुए। नरेंद्र मोदी ने आपातकालीन टनल का जायजा लिया। पीएम मोदी ने लाहुल स्पीति जिला में टनल के दूसरे छोर नार्थ पोर्टल पर पहुंच कर बस को हरी झंडी दी। इस बस में लाहुल के बुजुर्गों ने सफर किया। प्रशासन ने 15 बुजुर्गों का चयन किया था, जिसमें से 14 लोग बस में सवार थे।
पीएम मोदी ने बीआरओ को सुझाव दिया 1500 ऐसे लोग चिह्नित करें, जो अपना अनुभव लिखें। इसमें मजदूरों व इंजीनियरों को शामिल करें। शिक्षा मंत्रालय से आग्रह किया कि तकनीकी शिक्षा से जुड़े विद्यार्थियों से केस स्टडी करवाएं। दुनिया को हमारी इस ताकत का ज्ञान होना चाहिए।
पीएम मोदी बोले, मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है जो अटल टनल के लोकार्पण का अवसर मिला। बतौर भाजपा प्रभारी हिमाचल से गहरा नाता रहा है। अटल जी जब प्रीणी स्थित आवास पर आते थे तो वह तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ उनसे मिलते थे। अटल जी से सुरंग निर्माण को आग्रह करते थे और बाद में यही प्रोजेक्ट उनका सपना बन गया। आज यह सपना पूरा हो गया। अभेद्य पीरपंजाल को भेदकर, आज कठिन स्थिति से पार पाया गया है। जान जोखिम में डालने वाले, जवानों, इंजीनीयरों मजदूरों को नमन करता हूं।
उल्लेखनीय है कि रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक महत्व की सुरंग बनाए जाने का ऐतिहासिक फैसला तीन जून, 2000 को लिया गया। जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। सुरंग के दक्षिणी हिस्से को जोडऩे वाली सडक़ की आधारशिला 26 मई, 2002 को रखी गई थी। मई 1990 में प्रोजेक्ट के लिए अध्ययन शुरू किया गया। सीमा सडक़ संगठन (बीआरओ) के अधिकारियों के मुताबिक प्रोजेक्ट को 2003 में अंतिम तकनीकी स्वीकृति मिली। जून 2004 में परियोजना को लेकर भू-वैज्ञानिक रिपोर्ट पेश की गई। 2005 में सुरक्षा पर कैबिनेट कमेटी की स्वीकृति मिलने के बाद 2007 में निविदा आमंत्रित की गई। दिसंबर 2006 में परियोजना के डिजाइन और विशेष विवरण की रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया गया। जून 2010 में यह सुरंग बनाने का काम शुरू कर दिया गया। इस परियोजना को फरवरी 2015 में ही पूरा होना था, लेकिन विभिन्न कारणों से इसमें देरी होती रही। मौसम की जटिलता और पानी के कारण कई बार निर्माण कार्य बीच में ही रोकना पड़ा। टनल को बनाने के लिए खुदाई का काम 2011 में ही शुरू हो गया बीआरओ को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पहले 2015 में इस प्रोजेक्ट की समय सीमा थी। बाधाओं और चुनौतियों के कारण यह समय सीमा आगे खिसकती रही, लेकिन बीआरओ ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला किया। इन चुनौतियों में निर्माण के दौरान सेरी नाला फॉल्ट जोन, जो तकरीबन 600 मीटर क्षेत्र का सबसे कठिन स्ट्रेच शामिल था। यहां एक सैकेंड में 140 लीटर पानी निकलता था। ऐसे में निर्माण बहुत मुश्किल और चुनौतीपूर्ण था। सुरंग के दोनों सिरों का मिलान 15 अक्टूबर, 2017 में हुआ। शुरुआत में टनल की लंबाई 8.8 किलोमीटर नापी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अब इसकी पूरी लंबाई 9.02 किलोमीटर है। इसे बनाने में लगभग 3,000 संविदा कर्मचारियों और 650 नियमित कर्मचारियों ने 24 घंटे कई पारियों में काम किया।


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