राष्ट्रीय जनमोर्चा ब्यूरो
मुंबई। शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के विधायकों ने उद्धव ठाकरे को सर्वसम्मति से नेता चुन लिया है और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया है। 28 नवंबर की शाम 6 बजकर 40 मिनट पर उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। उसके बाद 3 दिसंबर को ठाकरे बहुमत सिद्ध करेंगे।
उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में पिछले एक महीने से अधिक समय से चली आ रही सियासी उठापटक अब समाप्त हो गई है। मंगलवार देर शाम शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के विधायकों ने उद्धव ठाकरे को सर्वसम्मति से नेता चुन लिया और राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। कल यानी 28 नवंबर की शाम 6 बजकर 40 मिनट पर उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। उन्हें 7 दिन में यानी 3 दिसंबर को बहुमत साबित करना होगा।
इससे पहले उद्धव ठाकरे एक दिसंबर की शाम 5 बजे ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में शपथ ग्रहण करने वाले थे, लेकिन इसे भी टाल दिया गया। फिर 28 नवंबर को शपथ ग्रहण का दिन तय हुआ। समय भी वही रहा, लेकिन इसे भी टाल दिया गया। कांग्रेस नेता बाला साहेब थोराट ने मंगलवार देर रात कहा कि उद्धव ठाकरे शिवाजी पार्क में कार्यकर्ताओं के सामने 28 नवंबर को 6 बजकर 40 मिनट पर शपथ लेंगे।
‘दोस्त’ से नाता तोड़ सत्ता!
28 नवबंर की तारीख को महाराष्ट्र की सियासत में नया इतिहास लिखा जाएगा। मुंबई के शिवाजी पार्क में जब उद्धव बाल ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे तो बाला साहेब ठाकरे का वर्षों पुराना सपना हकीकत में बदल जाएगा। इसी के साथ ही ठाकरे खानदान का पहला शख्स महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज होगा। हालांकि इस सपने के पूरे होने से पहले दोस्ती के कई उसूल टूटे। दो भाइयों के बीच दीवार खड़ी हुई। बाला साहेब के सामने एक ऐसा वक्त आया, जब उन्हें अपने बेटे और भतीजे के बीच में से किसी एक चुनना था। उद्धव ठाकरे सामने आने वाली बाधाओं को रौंदते गए और अब महज कुछ वक्त के फासले के बाद वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री होंगे।
राज-उद्धव की जोड़ी
जब महाराष्ट्र में बाला साहेब की तूती बोलती थी, उस दौरान उद्धव और राज उनके दो सिपहसालार थे। उद्धव और राज चचेरे भाई हैं। उद्धव सियासत से खिंचे-खिंचे रहते थे, उनका फोटोग्राफी में मन लगता, लेकिन राज ठाकरे दबंग और मुखर थे। लोगों को उनमें चाचा बाल ठाकरे की छवि नजर आती थी। राज ठाकरे तेजी से शिवसैनिकों के बीच लोकप्रिय होते जा रहे थे। साल 2002 में बीएमसी के चुनावों में शिवसेना को कामयाबी मिली तो बाला साहेब ठाकरे ने उद्धव को 2003 में शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया। इस चुनाव में राज ठाकरे की सिफारिश वाले लोगों के टिकट काट दिए गए।
2004 में उद्धव को बाकायदा शिवसेना का अध्यक्ष घोषित किया गया। हालांकि उन्होंने शिवेसना का अध्यक्ष पद औपचारिक रूप से साल 2013 में संभाला था। इधर राज ठाकरे के मन में खटास बढ़ती जा रही थी।आखिरकार 2006 में वो वक्त आ ही गया, जब राज ठाकरे मातोश्री से अलग हो गए। उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से अलग पार्टी बना ली। हालांकि उद्धव कहते हैं कि उन्होंने कभी राज ठाकरे को मातोश्री छोड़कर जाने को नहीं कहा था।
दूर हुए दो दोस्त
24 अक्टूबर, 2019 को जब महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आए तो उद्धव ठाकरे को इसमें एक उम्मीद नजर आई। उद्धव को लगा कि महाराष्ट्र में ठाकरे राज के आगाज का इससे बेहतर मौका हो ही नहीं सकता है। उद्धव ठाकरे ने बाला साहेब को दिए वचन का हवाला बीजेपी को दिया और उनके सामने 50-50 फॉर्मूले की शर्त रख दी। बीजेपी के लिए ये सब अप्रत्याशित था। शिवसेना पिछले पांच साल में कई बार बागी तेवर अख्तियार कर चुकी थी, लेकिन हर बार कुछ मिन्नतों, कुछ समझौतों के बाद वापस आ जाती थी, लेकिन इस बार उद्धव थे कि टस से मस नहीं हो रहे थे। उनकी एक ही शर्त थी मुख्यमंत्री पद।
2014 में बीजेपी ने छीना बड़े भाई का रोल
दरअसल उद्धव ठाकरे को पिछले पांच साल से ये मलाल था कि 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उससे बाला साहेब ठाकरे की विरासत छीन ली थी। महाराष्ट्र की सियासत का जो रिमोट कंट्रोल मातोश्री में रहता था वो अब बीजेपी के कंट्रोल में चला गया था। 2014 के चुनाव में उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उनकी पार्टी 63 सीटें ही जीत पाई। जबकि बीजेपी को 122 सीटें मिलीं और शिवसेना के हाथ से सत्ता की चाबी निकल गई।
टूट गई 30 साल पुरानी दोस्ती
लेकिन इस बार के नतीजे कुछ ऐसे थे कि बीजेपी के लिए शिवसेना का साथ अपरिहार्य था। बस उद्धव ने खुले आम अपनी महात्वाकांक्षा जाहिर कर दी। उद्धव की ये महात्वाकांक्षा बीजेपी-शिवसेना के बीच सियासी दुश्मनी में बदल गई। सवाल 30 साल की दोस्ती का था। विचारधारा से इतर जाने का था, लेकिन उद्धव जिद पर अड़े रहे। उन्होंने धारा के विपरीत चलना स्वीकार किया, लेकिन इस बार उन्हें सिंहासन हर हाल में चाहिए था। आखिर कुछ चटक और कुछ मरोड़ के साथ बीजेपी-शिवसेना की वर्षों पुरानी दोस्ती टूट गई। अब 28 नवम्बर को उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे।


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