कपिल कांत श्रीवास्तव
सुल्तानपुर। कभी ये बखारियाँ इस घर में रहने वालों की संपन्नता की पहचान हुआ करती थीं। मिट्टी की मोटी-मोटी दीवारों वाले ये घर जब बनाएं गए थे तब इस घर को बनाने में जिन्होंने मेहनत की थी, उनसे कभी पूछिएगा कि इसको बनाते समय उन्होंने अपनी कितनी ऊर्जा खर्च किया था।
बुजुर्ग बताते थे कि जब किसी का नया घर बनता था तो मिट्टी ढोकर लाते-लाते उस घर की महिलाओं के सर घिस जाया करते थे। तब के समय में भी छप्पर से खपरैल मकान बनवाना भी कहां आसान था? आमदनी कम थी और ऐसे में सिर्फ घर बनाने वाले कारीगर ही पैसे देकर रखे जाते थे, बाकी के सारे काम घर के सदस्य मिलकर करते थे। पुरुष तालाब से मिट्टी खोदते थे और महिलाएं व बच्चे मिट्टी ढोकर लाते थे, तब इस मिट्टी से घर की मोटी-मोटी दिवारें बनाई जाती थीं।
ये जो घर अब खंडहर में तब्दील हो रहे हैं, इनको बनाने में हमारे पुरखों का बहुत पसीना बहा है। हर साल बारिश शुरू होने से पहले घर की छत को अनगवाया (मरम्मत) जाता था। टूटे-फूटे खपड़ा-नरिया हटाकर नए लगाए जाते थे, ताकि टपके न और घर की उम्र और लंबी हो।
वर्ष भर में एक-दो बार सारे घर की दीवार चिकनी मिट्टी घोलकर कपड़े से पोती जाती थी और हर हफ्ते या 15 दिन में सारे घर की फर्श गोबर-मिट्टी मिलाकर लीपा जाता था। गाय के गोबर से घर लीपने से घर साफ और सुंदर तो होता ही था, साथ में रोगमुक्त भी हो जाता था, क्योंकि गाय के गोबर में एंटी बैक्टीरिया गुण होते हैं। अब तो इन घरों के बगल में ऊंची-ऊंची ईंट की दीवारों वाले बड़े-बड़े पक्के मकान बन चुके हैं। अब इनमें मिट्टी या गोबर से लिपाई-पोताई नहीं होती है।
हमारे पुरखों के साथ-साथ उनके बनवाए गए खुबसूरत घर भी अब बूढ़े हो चुके हैं। लेकिन अब हम इन कच्चे-पुराने घरों को छोड़कर बड़े पक्के मकानों में भले रहने लगें है पर कच्चे आंगन में जो बचपन, किशोरावस्था गुजरा है वह हमारे दिलों में आज भी बसा हुआ है। इसीलिए इन खंडहर होते घरों को देखने पर बरबस अपना बचपन और इनमें बिताए हुए अनमोल क्षण याद आ जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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