दिग्भ्रमित क्यों है ब्राह्मण समाज: कृष्णा द्विवेदी

आजकल सोशल मीडिया पर समाज कई धड़ों में बंट-सा गया है। तथाकथित बुद्धिजीवियों को तो छोड़ो, दुख तो इस बात का है कि सबसे ज्यादा ब्राह्मण समाज दिग्भ्रमित होता दिख रहा है। किसी आततायी या अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति का समर्थन सिर्फ इसलिए कि वह जन्मजात ब्राह्मण है। भाइयों, उसके कर्म पर भी एक नजर डालिये, उसने देश-धर्म या ब्रह्मणत्व के लिए क्या योगदान दिया है, उसने अपनों को सिर्फ अपने लिए मारा है, जिनकी हत्याएँ हुई हैं, क्या उनके मां बाप निराश्रित और उनके बच्चे अनाथ नहीं हुए हैं? हममें से कितने लोगों ने उन अनाथ बच्चों के सिर पर सान्त्वना का हाथ फेरा है, पुलिस और शासन-प्रशासन की कार्य शैली अवश्य संदिग्ध और निंदनीय है, परंतु प्रशंसनीय तो उसकी भी नहीं थी।

जब रील लाइफ की काल्पनिक कहानियों की फिल्मों से हमारा समाज प्रेरणा लेता हो, तब रियल लाइफ में किसी अपराधी का महिमामंडन करना कहां तक उचित है? आप स्वयं विचार करें, क्या आपराधिक प्रवृत्ति वाले बच्चे इससे प्रेरणा नही लेंगे, जो समाज अपनी आलोचना सुनने की सहनशीलता व सत्य-असत्य में अंतर करने की क्षमता खो देता है, उसका ह्रास प्रारम्भ हो जाता है। जिन ब्राह्मणों की दुहाई देकर निंदनीय कृत्य को उचित ठहराने की कोशिश की जा रही है, यह भी कितना उचित है? सोचिए, जवाब अपने आप में ही मिल जायेगा।

ब्राह्मण सिर्फ इसलिए पूज्य नहीँ माना गया था कि वह जन्म से ब्राह्मण था, बल्कि इसलिए कि उसने दो रोटी और दो लँगोटी के बदले समाज को बहुत कुछ दिया था। राजतन्त्र का इतिहास उठाकर देख लीजिए, ब्राह्मण ने कुल पुरोहित बनकर सिर्फ पूजा ही नहीं कराई है। शास्त्र के साथ-साथ आवश्यकता पडऩे पर शस्त्र का भी ज्ञान दिया है। शिक्षा, चिकित्सा, आयुध आविष्कार, गुप्तचर व्यवस्था सब कौन देता था समाज को उस समय? इसलिए आज के परिप्रेक्ष्य में भी हमें सत्य का ही साथ देना चाहिए। पुलिस की कार्य प्रणाली संदिग्ध है तो उसकी भी घोर भर्त्सना होनी चाहिए परन्तु सजा तो उस विभाग में बैठे जयचन्दों को भी मिलनी चाहिए, निर्दोष तो उस जज को भी नहीं कहा जा सकता है, जिसने इतने संगीन अपराध में वांछित अपराधी की जमानत मंजूर की होगी। आम आदमी का क्या लगता है पुलिस को भी न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं था, इसलिए अपने कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर स्वयं न्याय भी कर दिया।

हर गलत रास्ता गलत मंजिल तक ही पहुंचाता है। जिस पिता को उसी घर में रहते हुए बेटेद्वारा चलाई गई गोलियों की आवाज जब नहीं सुनाई पड़ती है, सैकड़ों मासूम और मजबूर लोगों की चीखों का सूत्रधार उसी पिता के सानिध्य में पला हो तो उस पिता को ऐसे दिन देखना असम्भव नहीं है। अगर माता-पिता के सद्कर्मों की विरासत पुत्र को मिलती है तो दुष्कर्मों की कौन लेगा? किसी एक जाति, पंथ या सम्प्रदाय से सम्पूर्ण समाज का निर्माण नहीं होता है। आवाज उठाइए, जो भी दोषी हों उनको कड़ी से कड़ी सजा मिले। साथ में हम सभी का पूरे समाज का दायित्व बन जाता है कि समाज के अंदर फैली उस विष बेल को समूल नष्ट करें, जिसका आश्रय लेकर अपराधी पैदा होता, पनपता और फलता-फूलता है।

बिल्लियों की लड़ाई में रोटी हमेशा बन्दर ही खाता आया है:
मित्रों, यह समय जोश में नहीं होश में रहकर सोचने का है। अपने समाज के खिलाफ बहुत बड़ी साजिश हो रही है और हम धीरे-धीरे उस साजिश का हिस्सा बनते जा रहे हैं। जिनके जीवन भर की सारी राजनीति सिर्फ ब्राह्मण और हिंदुत्व के विरोध पर टिकी थी। वे आज सब के तथाकथित हितैषी बनकर पूरे समाज को तोडऩे का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। जिस व्यक्ति को हिंदी में ब्राह्मण शब्द लिखना शायद नहीं आता होगा तथा जिसकी पांच पीढिय़ों में सारे धर्म और सारे कर्म समाहित हैं, वह सर्वाहारी ब्राह्मण बनकर सबको ब्रह्मणत्व की सीख दे रहा है।

भारतवर्ष सिर्फ ब्राह्मण समाज से ही नहीं बना है, जो भी समाज इस राष्ट्र एवं यहाँ के समस्त समाज को अपना मानता है, वे सभी हमारे अपने हैं। हम भगवान परसुराम के वंशज अवश्य हैं पर क्या स्वामी राम कृष्ण, विवेकानंद, गुरु नानक देव, कबीर, सूर, तुलसी, रैदास, मीराबाई और सन्त तुकाराम को हम भूल जाएंगे। स्वामी दयानंद के तर्क, बुद्ध, महावीर की अहिंसा के उपदेश व समर्थ गुरु रामदास की राज्य व्यवस्था की शिक्षा को क्या हम तिलांजलि दे पाएंगे। कभी नहीं।

ब्रह्माजी को भी सृष्टि के संचालन में सभी की आवश्यकता पड़ी है। देवताओं के सिविल चीफ इंजीनियर विश्वकर्माजी हैं, सृष्टि के कर्मों का लेखा-जोखा भगवान चित्रगुप्त के अधीन है, जल निगम का भगीरथ से बड़ा सृष्टि में कोई इंजीनियर हो तो बताइयेगा, पर क्या ये सभी ब्राह्मण ही थे ?? बन्धुओं, अपनी सोच बड़ी रखिये, बिल्लियों की लड़ाई में रोटी हमेशा बन्दर ही खाता आया है। किसी व्यक्ति या समाज का मूल्यांकन उसकी बुराई देखकर ही नहीं उसकी अच्छाइयों को भी देखकर तब परिणाम निकालिए। कहीं ऐसा न हो कि मुर्गी की बीमारी में हम भैंसे की बलि चढ़ा बैठें।
(लेखक चिंतक व समाजसेवी हैं।)

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