क्यों थम-सी गई है जिंदगी

-सरिता वर्मा
इस कोरोना काल में जो वर्तमान परिस्थितियां हैं वो इस कवि हृदय से कुछ प्रश्न करती हैं। जिन्हें मैंने प्रशनात्मक शैली में कविताबद्ध किया है। पेश है आपकी नजर…

क्यों थम-सी गई है जिंदगी?
क्यों हर धड़कन में एक आह जगी?
क्यों विकराल रूप लिया महामारी ने?
क्यों सिसकारियों से हर रूह थमी?
क्यों हर कोई विचलित-सा है यहां?
क्यों सांसें थक-सी जाती हैं?
क्या दोष है ये मानुष कृत का?
या ईश्वर ने दी चेतावनी है।
क्यों सांसों का बाजार बना
ये विश्व नए परियोजन से?
क्या रूह न कांपती होगी इनकी
अपने ऐसे प्रलोभन से?
क्या मानुष, मानुष की ऐसी दशा का
खुद को दोषी कह पाएगा?
या मनुष्यता हावी होगी चित पर
कि निर्भय हो दोष हटाएगा।
क्यों मनुज हृदय विषाद हुआ?
क्यों धड़कनों का व्यापार हुआ?
क्यों कोई मसीहा नहीं आता,
प्राणों का रक्षक बनकर?
क्यों लाखों चिंताएं हैं आज जली?
क्यों धड़कन में एक आह जगी?
क्यों थम-सी गई है जिंदगी?
क्यों थम-सी गई है जिंदगी?
(लेखिका एक शिक्षिका हैं और कई समाजसेवी संस्थाओं से जुड़ी हैं।)

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