सबकी मनमानी का किस्सा बहुत हुआ: नेहा वैद

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान ने नव संवत्सर के स्वागत में एक काव्य-गोष्ठी एवं परिचर्चा का आयोजन किया। रविवार, 3 अप्रैल को राजनगर डिस्ट्रिक्ट सेंटर स्थित एक कार्यालय में संपन्न हुए इस सृजन-उत्सव में सरस्वती पूजन के साथ-साथ क़रीब 12 कवियों ने काव्य-पाठ किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रख्यात नवगीतकार जगदीश पंकज ने कहा कि साहित्य अपने देशकाल का इतिहास दर्ज करता हुआ चलता है। उसमें अपने समय का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, इसलिए कविता सिर्फ़ स्वांत सुखाय नहीं हो सकती है। एक कवि को अपने युगधर्म का निर्वाह करती हुई कविताएँ लिखनी चाहिए। अपने एक नवगीत के माध्यम से वह कहते हैं- तथागत मौन हैं पर कह रहे हैं, भिक्षुओं कुछ प्रश्न इस युग के उठाओ…
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रख्यात पर्यावरणविद एवं गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड के निदेशक संजय कश्यप एडवोकेट ने कहा कि साहित्यकारों को आज की सर्वाधिक विकट समस्या ख़राब हो रहे पर्यावरण पर भी लिखना चाहिए। कला-साहित्य के क्षेत्र में ग़ाज़ियाबाद की एक विशिष्ट पहचान बन रही है। उस पहचान को बनाने में अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान एक अहम भूमिका अदा कर रहा है।
इससे पहले कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित किया गया। सुश्री नेहा वैद ने सरस्वती वंदना की संगीतमय प्रस्तुति दी। काव्य पाठ करते हुए ‘उदभावना’ पत्रिका के संपादक रहे सीताराम अग्रवाल ने बेहद उम्दा ग़ज़लें कहीं।उनके इस शेर को बहुत सराहा गया- काट कर ले गया फसल वो, जो कभी उसको बोता नहीं है…
अमर भारती संस्थान के अध्यक्ष डॉ रमेश कुमार भदौरिया के अलावा महासचिव प्रवीण कुमार, सुश्री नेहा वैद, आशुतोष कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ छायाकार एवं कवि श्री कुलदीप, डॉ पूनम सिंह, डॉ नीरज कुमार मिश्र, सुश्री सरिता शर्मा आदि ने अपनी शानदार रचनाओं पर खूब वाहवाही लूटी। आशुतोष कुमार श्रीवास्तव की इन पंक्तियों पर विशेष दाद मिली-
घोर निराशा में कुछ आशा
के दीपक यदि रोज़ जलाएँ
पता नहीं कब आकर बादल
स्वतः: धरा की प्यास बुझाएँ

कार्यक्रम का संचालन संस्थान के महासचिव प्रवीण कुमार ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र बच्चन एवं सुश्री ऋतु श्रीवास्तव जैसे प्रबुद्ध श्रोता मौजूद रहे।

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