महफ़िल-ए-बारादरी : ‘मोहल्ले बंट रहे हैं मजहबों में…’

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। ‘प्रेम एक शाश्वत सत्य है। प्रेम इंसानियत का बीज है। प्रेम से आप दुनिया को फतह कर सकते हैं, नफरत से एक दिन दुनिया तबाह हो जाएगी। नफरत की बोली और बम के बीच हमें मोहब्बत के बीज बोने हैं। जो महफ़िल ए बारादरी जैसे कार्यक्रमों में ही संभव है।’ देश के प्रख्यात कवि डॉ. अखिलेश मिश्रा ने उक्त उद्गार महफ़िल ए बारादरी में बतौर अध्यक्ष प्रकट किए। प्रेम के विभिन्न आयामों को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा ‘बच्चे दादी से मोहब्बत की कहानी पूछें, कैसी थी बीते जमाने में जवानी पूछें। क्यूं तड़पती है दरिया से निकाली मछली, लगाए आग क्यूं बरसात का पानी पूछें…।’ सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित महफिल ए बारादरी में अपने गीत और ग़ज़लों पर भरपूर दाद बटोरते हुए डॉ. मिश्रा ने कहा ‘मुझे सारे जमाने की पड़ी है, उसे अपने फसाने की पड़ी है। मोहल्ले बंट रहे हैं मजहब में, किसे बस्ती बसाने की पड़ी है।’
कार्यक्रम के विशेष आमंत्रित अतिथि व हास्य व्यंग्य के चर्चित हस्ताक्षर पंकज प्रसून ने अपनी रचनाओं पर जहां जमकर दाद बटोरी, वहीं श्रोताओं को कई बार भावुक भी किया। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘लड़कियां बड़ी लड़ाका होती हैं’ भरपूर सराही गई। मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित मशहूर दोहाकार राजेश श्रीवास्तव ने भी अपने शेरों और दोहों पर जमकर दाद बटोरी। उन्होंने कहा ‘घर का डिब्बा खाली है कैसे कहें दिवाली है, दुनिया की सरकारों पर भूखा बच्चा गाली है।’ संस्था की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने अपने अशआर ‘जब तसव्वुर सजाने लगती हूं, रेत का घर बनाने लगती लगती हूं। याद आता है जब मुझे माज़ी, मैं परिंदे उड़ाने लगती हूं’ पर भरपूर दाद बटोरी।
संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने कहा ‘आग कुछ ऐसी लगी है मेरे भीतर अबके, सूख जाएगा बुझाने में समंदर अबके।’ कार्यक्रम का सफल संचालन नंदिनी श्रीवास्तव ने किया। उन्होंने अपने गीत की पंक्तियों ‘आप बीती चीख कर कहने लगे किरदार सारे, आज जब पढ़ने लगी मैं, प्रेम की सारी कथाएं…’ पर विशेष रूप से ध्यान खींचा। कार्यक्रम का शुभारंभ आशीष मित्तल की सरस्वती वंदना से हुआ। मशहूर शायर सुरेंद्र सिंघल के शेर ‘दिए की लौ हवाओं से बुझी है, गगन की फाइलों में खुदकुशी है। मैं पगडंडी पे भी बचकर चलुं हूं, बुरी आदत सड़क की पड़ गई है’ और मासूम गाजियाबादी के शेर ‘भला मरता है क्यूं तिल-तिल बतइयो, कहानी कुछ तो ए बिस्मिल बतइयो। जो जैसा हो उसी काबिल बतइयो, मगर मकतल को मत महफ़िल बतइयो’ लीक से हटकर चलते दिखाई दिए।
ओम प्रकाश यति ने अपने सामयिक मुहवरेदार शेरों ‘जहां मन हो बिछा लेते हैं बिस्तर ले के चलते हैं, वो घर-परिवार, बर्तन, नून-शक्कर ले के चलते हैं। यहां तो डर लगा रहता है बुलडोजर का ही हरदम, चलो भाई यहां से टीन-टप्पर ले के चलते हैं’ पर जमकर वाह-वाही बटोरी। कीर्ति रतन के शेर ‘अभी कुछ ज़िंदगी बाक़ी है, मरा नहीं रिश्ता, किसी की उन निगाहों में मैंने ये लिखा देखा। आज फिर से वो बिना बात किए सोया है, सुब्ह मेरा भी है तय सिलवटों का गिनना’ और आशीष मित्तल का कहा ‘वक़्त होता है बस बुरा अच्छा, दिल से कोई बुरा नहीं होता। दिल के रखने को कह दिया होगा, क़दमों में आसमां नहीं होता’ भी खूब सराहा गया।
मंजु ‘मन’ ने कहा ‘बस तू अपने दिल की सुन छोड़ रिवायत रहने दे, मुश्किल से माना है ‘मन’ और शरारत रहने दे। अनिमेष शर्मा ने फ़रमाया ‘सौ बार निगाहों में नमस्कार हुए हैं, तब जा के वो गुफ़्तार को तैयार हुए हैं।’ इस अवसर पर, सुभाष चंदर, डॉ. तारा गुप्ता, आलोक यात्री, इंद्रजीत सुकुमार, आशीष मित्तल की रचनाएं भी सराही गईं। नवोदित प्रतिभा पल्लवी त्रिपाठी को ‘नवदीप सम्मान’ और आस्ट्रेलिया से आईं कवयित्री मंजुला ठाकुर को ‘अप्रवासी अतिथि सम्मान’ प्रदान किया गया। कार्यक्रम में शिवराज सिंह, तिलक राज अरोड़ा, वागीश शर्मा, रवीन्द्र कांत त्यागी, अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव, रुचिका अग्रवाल, चित्रा अग्रवाल, डी. के. गांधी, राष्ट्रवर्धन अरोड़ा, आशीष ओसवाल, रवि शंकर पाण्डेय, देवेंद्र गर्ग, शुकम मिश्रा, मनीषा मालकोटे, नरेश कुमार सहित बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित थे।

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