कविता के जरिए ही संवरता है समाज, विचार और इंसान : डॉ. प्रभा ठाकुर

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। नेहरूनगर स्थित एक स्कूल में आयोजित महफ़िल-ए-बारादरी की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं राज्यसभा की पूर्व सदस्य डॉ. प्रभा ठाकुर ने कहा कि समाज में लोग भले ही विभिन्न पेशे से आते हैं, लेकिन कविता उन्हें एक धरातल पर जोड़ लेती है। उन्होंने कहा कि कविता का मकसद इंसानियत को जिंदा रखना है। कविता के जरिए बहुत-सी चीजों को संवारा जा सकता है। जिसमें समाज, विचार और इंसान सभी शामिल हैं।
प्राणों को अंतर्मन के अधीन :
डॉ. प्रभा ने अपनी कविता ‘दिशाहीन होने दो’ “नपे तुले कदमों से, लगे बंधे रास्तों पर चलना, अब दुष्कर है, कल के या परसों के अनुबंधों को तोड़ो, अंतर की घाटी से आता अब यह स्वर है, प्राणों को अंतर्मन के अधीन रहने दो, दिशाहीन होने दो। आतंकित शंखनाद, बहरे गूंगे विवाद, कुंठा, लिप्सा का वाद, देव देव का प्रसाद, धर्मवाद, धन्यवाद, इन सब से पा निजात, भारहीन होने दो, दिशाहीन होने दो…” के माध्यम से समाज को एक नई दिशा देने की कोशिश की।
क्योंकि जाग रहा हूं मैं :
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध शायर व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आदेश त्यागी ने अपनी बात कुछ यूं शुरू की, “क्या है जिसने मेरे दिल में इतनी हिम्मत भर दी है, मुझ में है कानून की ताकत तन पर खाकी वर्दी है। तुम्हें बचाने अपराधी के पीछे भाग रहा हूं मैं, तुम सो जाओ नींद चैन की क्योंकि जाग रहा हूं मैं…” से शुरू की। उन्होंने अपने शेरों पर जमकर वाहवाही बटोरी। उनकी पंक्ति “पढ़ते कैसे तुम मुझे कैसे मुश्किल थे हालात, तुमको आदत लफ्ज़ की मैं खाली जज्बात…” भी खूब सराही गई।
और फिर शर्मसारी रही उम्र भर :
संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने फ़रमाया “इसलिए रहता नहीं कोई नया डर मुझमें, आईना जागता रहता है बराबर मुझमें…।” “मेरी नजरों ने बरसात में छू लिया उसका गीला बदन, उससे नजरें मिली और फिर शर्मसारी रही उम्र भर…।” बारादरी की संस्थापक डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने अपने अशआर “तुम बसे थे मेरे फसानों में, किसकी आहट है फिर ये कानों में। हर जबां में हो एक जैसे ही, पढ़ लिया तुमको सब जबानों में” पर खूब दाद बटोरी।
तब ज़रा राहत मिली :
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. तारा गुप्ता की सरस्वती वंदना से हुई। कार्यक्रम का संचालन भी उन्होंने ही किया। प्रतिभा प्रीत ने फ़रमाया “इश्क़ में मुझको सभी से मुख्तलिफ़ क़िस्मत मिली, दिल हुआ जब पारा पारा तब ज़रा राहत मिली। हम तो समझे थे कि ख़ुशियां कर रहे हैं हम जमा, फोड़ी पर जब दिल की गुल्लक दर्द की राहत मिली…।”
इनकी रचनाएं भी सराही गईं :
गुंजन अग्रवाल ‘अनहद’, मनीषा जोशी ‘मनी’, वागीश शर्मा, ओमपाल सिंह ‘ख़लिश’, अनिमेष शर्मा, सुभाष चंदर, राजेश श्रीवास्तव, कृष्ण कुमार ‘नाज़’, आलोक यात्री, मनु लक्ष्मी मिश्रा, डॉ. अमर पंकज, राजीव सिंघल, प्रेम किशोर शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, अनिल शर्मा, देवेंद्र देव, जे.पी. रावत, सौरभ कुमार और सिमरन की रचनाएं भी सराही गईं।
महफ़िल-ए-बारादरी का लिया आनंद :
इस अवसर पर आभा बंसल, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, कुलदीप, भूपेंद्र राघव, अजय कश्यप, आशीष मित्तल, प्रभा मित्तल, मोदिता काला, सत्य नारायण शर्मा, रंजन शर्मा, रवि शंकर पाण्डेय, अंजलि, हेमंत कुमार, संजय भदौरिया, वीरेंद्र सिंह राठौर, दीपा गर्ग, पी.के. शर्मा, पी.एस. पंवार, तिलक राज अरोड़ा समेत बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद रहे।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*