बारादरी में दनकौरी, गुलशन, गौहर, नाज़ संग सजी तरानों की महफ़िल

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। महफिल-ए-बारादरी को संबोधित करते हुए जाने-माने शायर शहपर रसूल ने कहा कि गाजियाबाद के फनकारों ने इस मशीनी शहर की रूह को शायरी बना दिया है। यह वह शहर है जहां फनकारों के नाम पर बाकायदा एक मोहल्ला कवि नगर भी मौजूद है। अपने खास शेर “मैंने भी देखने की हद कर दी, वह भी तस्वीर से निकल आया” पर उन्होंने जमकर दाद बटोरी। उनके अन्य अशआर “महफिल में जब से उसने पुकारा हमारा नाम, दुश्मन बना हुआ है हमारा, हमारा नाम। तुमको पुकारते हैं, हमें देखते हैं लोग, जैसे एक ही हो तुम्हारा हमारा नाम” भी काफी सराहे गए।
उसने दीवार उठाई थी गिरा दी मैंने…
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शाहपुर रसूल ने कौमी एकता को महफूज रखने की पैरवी कुछ यूं की, “बद्दुआ उसने मुझे दी थी दुआ दी मैंने। उसने दीवार उठाई थी गिरा दी मैंने। उसने सैलाब की तस्वीर बनाकर भेजी थी, उसी कागज से मगर नाव बना दी मैंने।” हालात का बयां करती उनकी पंक्तियां “अबके भी एक आंधी चली, अबके भी सब कुछ हो गया, अबके भी सब बातें हुई, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। अरे से, ओ से, अबे से, जनाब हो गए क्या, अभी तो अच्छे भले थे, खराब हो गए क्या” भी खूब सराही गईं।
वह बार-बार नजर से नजर उतारता है…
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कृष्ण कुमार ‘नाज़’ की पंक्तियों “रोशनी के वास्ते धागे को जलते देखकर, ली नसीहत मोम ने उसको पिघलना आ गया। शुक्रिया बेहद तुम्हारा शुक्रिया ए पत्थरों, सर झुकाकर जो मुझे पत्थरों पर चलना आ गया। चांद को छूने की कोशिश में तो नाकामी मिली, हां मगर नादान बच्चे को उछलना आ गया। पहले बचपन, फिर जवानी, फिर बुढ़ापे के निशान, उम्र को भी देखिए कपड़े बदलना आ गया” पर भी खासी दाद मिली। महफ़िल ए बारादरी के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने सूफियाना अंदाज में कहा “यह आसपास मेरे कौन शब गुजारता है, अगर मैं ख्वाब में जाऊं मुझे पुकारता है। कभी जो भीड़ की आंखों से मैं गुजर जाऊं, वह बार-बार नजर से नजर उतारता है।” कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि दीक्षित दनकौरी ने अपने असआर कुछ यूं पेश किए “मुझे भी सर झुकाना चाहिए था, मुझे पहले बताना चाहिए था। तड़पता देख कर बोला शिकारी, निशाना चूक जाना चाहिए था।”
सच्चा लगता है हर बहाना…
महफ़िल ए बारादरी की संरक्षिका डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने अपनी ग़ज़ल के शेरों “और होंगे जो शान से गुज़रे, हम जो गुज़रे तो जान से गुज़रे। उस तरफ़ ख़तरे घूमा करते हैं, उससे कहना कि ध्यान से गुज़रे। तुम बसे थे मिरे फ़सानों में, फिर ये आहट है किसकी कानों में। “सच्चा लगता है हर बहाना भी, कितने माहिर हो तुम बहानों में” के जरिए दाद बटोरी।
दाल में काला कुछ है…
कार्यक्रम की शुरुआत तूलिका सेठ की सरस्वती वंदना से हुई। कार्यक्रम का संचालन तरुणा मिश्रा ने किया। उनकी ग़ज़ल के शेर “किसी की आह से टकरा के खुल गईं आंखें, सदा ए दिल थी जिसे पा के खुल गईं आंखें। उखड़ रहे थे मेरी क़ब्र के सभी पत्थर, अजीब ख़्वाब था घबरा के खुल गईं आंखें” भी सराहे गए। शायर सुरेंद्र सिंघल ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा “कहता कुछ है यहां हर शख्स, तो करता कुछ है, शायद इस शहर के पानी में ही ऐसा कुछ है। आपको क्यों यह लगा दाल आपकी है जनाब, जब कहा मैंने यहां दाल में काला कुछ है।”
“स्त्री” को केंद्र में रखकर सुनाई गई रचनाएं…
महफ़िल में डॉ. तारा गुप्ता, रवि पाराशर, डॉ. वीना मित्तल, वागीश शर्मा, सुभाष अखिल, राजीव सिंघल, वी. के. शेखर, ओमपाल सिंह ‘खलिश’, सोनिया सोनम ‘अक्स’, आशीष मित्तल, डॉ. अमर पंकज, गार्गी कौशिक, संजीव शर्मा, मनीषा शर्मा, राजीव कामिल, डॉ. सुधीर त्यागी, देवेन्द्र कुमार शर्मा ‘देव’, अनिमेष शर्मा, सुरेंद्र शर्मा, इंद्रजीत सुकुमार की रचनाओं के अलावा ईश्वर सिंह तेवतिया की “पिता” व सुभाष चंदर की “स्त्री” को केंद्र में रखकर सुनाई गई रचनाएं भी भरपूर सराही गईं।
साहित्य प्रेमी रहे मौजूद
इस अवसर पर आलोक यात्री, तेजवीर सिंह, राखी अग्रवाल, कुलदीप, आर. के. मिश्रा, राकेश सेठ, पंडित सत्यनारायण शर्मा, विष्णु कुमार गुप्ता, दीपा गर्ग, संजय भदौरिया, वीरेंद्र सिंह राठौर, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, धनंजय वर्मा, प्रज्ञा मित्तल, आर. के. गोयल, शशिकांत भारद्वाज, रामप्रकाश गौड़, शकील अहमद, आभा बंसल, रिजवाना शहपर, बी. एल. बतरा, जावेद खान सैफ, एच. आर. सिंह, राजेश कुमार, ओंकार सिंह, प्रताप सिंह, रवि शंकर पांडे सहित कई साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

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