जितेन्द्र बच्चन
नई दिल्ली। केन्द्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान करीब 42 दिन से आंदोलित हैं। इस बीच 50 से अधिक किसान अपनी शहादत दे चुके हैं। इसके बावजूद उनके विरोध की धार कुंद नहीं पड़ी है। हक के लिए मौत से भी दो-दो हाथ करने को तैयार किसानों का दिल्ली के सभी बार्डरों पर गांधीवादी तरीके से धरना-प्रदर्शन जारी है। आंधी-तूफान और बारिश में भी उनका हौसला पस्त नहीं हुआ है, बल्कि बूढ़ी हड्डियों में जैसे दोगुना उत्साह भर उठा है। हाड़ कांपा देने वाली ठंड में भी उनका विरोध दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
पहाड़ों में बर्फबारी से मैदानी इलाके में भयंकर सर्दी पड़ रही है। ऊपर से बारिश और शीतलहर ने और कहर बरपा दिया है। इस बीच सरकार और किसान नेताओं के बीच आठ दौर की बातचीत हो चुकी है लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकाला है। शुक्रवार 8 जनवरी को बातचीत की नयी तारीख तय हुई है पर लगता नहीं कि सरकार और किसानों के बीच की बर्फ पिघलेगी। क्योंकि किसान केन्द्र के तीनों कृषि कानूनों की वापसी से कम पर किसी कीमत पर राजी नहीं हैं और मोदी सरकार को डर है कि अगर उसने आज किसानों की बात मान ली और कृषि कानूनों को वापस ले लिया तो नागरिकता कानून, तीन तलाक और धारा 370 आदि को वापस लेने के लिए बड़े आंदोलन खड़े हो सकते हैं, जो उसकी फजीहत कराएंगे और परेशानी का सबब भी बनेंगे।
सरकार कहती है कि वह किसानों के साथ जारी गतिरोध के बीच कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के तहत सुधारों पर चर्चा करने के अपने फैसले पर कायम है। केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर इसी दिशा में 11 जनवरी को परामर्श समिति के साथ बैठक करेंगे। उनका कहना है कि सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सुधारों में कोई बाधा न आने पाए लेकिन भाकयू नेता राकेश टिकैत ने राष्ट्रीय जनमोर्चा से बातचीत में कहा है कि सरकार के पास एक ही रास्ता है कि तीनों कानूनों को वापस ले। कानून वापसी नहीं तो घर वापसी नहीं।
हमारा मत है कि कृषि और किसान पहले से संकट में हैं। देश के तमाम किसान आत्महत्या कर चुके हैं। किसान संगठनों के साथ बैठकर सरकार को लाभकारी मूल्य के प्रावधान पर बात करनी चाहिए, ताकि आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार हो सके।
शुक्रवार को फिर होगी बातचीत
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा है, आंदोलनकारी किसानों के साथ अब तक अच्छी चर्चा हुई है। हम अभी किसी निर्णय तक तो नहीं पहुंच सके, लेकिन यह फैसला लिया गया है कि दोनों पक्ष शुक्रवार 8 जनवरी को फिर बातचीत की टेबल पर बैठेंगे। किसानों का सरकार पर पूरा विश्वास बना हुआ है। किसानों का कहना है कि सरकार ही इस विवाद का कोई हल ढूंढे। जब इस प्रकार के मामले होते हैं तो फैसला लेने से पहले कई दौर की चर्चा करनी पड़ती है।
किसानों को अपनी हठधर्मिता छोडऩी चाहिए
नोएडा के वरिष्ठ पत्रकार डॉ अनिल निगम कहते हैं- केन्द्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए तीन कानून जो बनाए हैं, उनको लेकर के विभिन्न प्रदेशों के कुछ किसानों में विरोध के स्वर उभरे हैं। किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं। किसानों की मांग है कि तीनों कानून रद्द किए जाएं। मेरा कहना यह है कि पिछले लगभग 72 वर्षों में विभिन्न पार्टियों की सरकारें रही हैं। उन्होंने कृषि के क्षेत्र में सुधार के लिए कोई प्रयास नहीं किए।
अगर भाजपा सरकार ने केन्द्र सरकार ने कुछ सकारत्मक बदलाव लाने के लिए कृषि के क्षेत्र में प्रयास किया है और तीन कानून बनाए हैं तो उनके जो अच्छे पहलू हैं, खासतौर से जो किसानों के बीच में दलाली को खत्म करने की बात है या उसको बाजार में अच्छा दाम मिलने की बात है, यदि इस तरह के विभिन्न सकारत्मक पहलुओं पर ध्यान दिया जाए तो ऐसा क्या हो गया कि किसान पूरी तरह से अड़े हुए हैं, इस हठधर्मिता पर आ गए हैं कि नहीं इन तीनों कानूनों को पूरी तरह से रद्द किया जाना चाहिए।
मेरा कहना यह है कि अगर इसमें कुछ विरोधात्मक बातें हैं या कुछ इसमें ऐसा कानून में प्रावधान है जो किसानों के हित में नहीं है, जिसके लिए सरकार ने भी वार्ता के द्वारा कहा है कि वह उन कानूनों में सरकार संशोधन करने को भी तैयार है। लेकिन किसानों की सिर्फ एक मांग कि नहीं इन तीनों कानूनों को रद्द किया जाए ये कहीं न कहीं जाहिर करता है कि इनके पीछे कहीं न कहीं राजनीति हो रही है। कुछ राजनीतिक दल लगे हुए हैं। जिनकी मंशा है कि ये किसी तरीके से कानून रद्द किए जाएं और ये वो साबित करने में लगे हैं कि ये कानून गलत थे और उनकी विजय हुई है। यह पूरी तरह से गलत है। मेरा मानना है कि किसानों को पूरी तरह से अपनी हठधर्मिता छोडऩी चाहिए और सरकार के साथ आगे बढऩा चाहिए। किसानों को यह भी जानना होगा कि उनकी हठधर्मिता से देश की अर्थव्यवस्था है, जो कामकाज है, वह सब प्रभावित हो रहा है। उनके धरने-प्रदर्शन से सभी का नुकसान हो रहा है। किसानों को आगे आना चाहिए और नई पहल करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की हालत पर जताई चिंता
कृषि कानूनों के विरोध में करीब 42 दिन से धरना दे रहे किसानों और सरकार के बीच सात दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक इसका कोई अंतिम नतीजा नहीं निकल सका है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने किसानों की हालत पर चिंता जताई है। कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग और किसानों के प्रदर्शन को लेकर दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने 11 जनवरी तक स्थगित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसानों के विरोध के संबंध में जमीन पर कोई सुधार नहीं हुआ है, केंद्र द्वारा कहा गया था कि इन मुद्दों को लेकर सरकार और किसानों के बीच स्वस्थ चर्चा चल रही है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि इस बात की अच्छी संभावना है कि निकट भविष्य में सरकार और किसान किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
सरकार को जल्द से जल्द समाधान करना चाहिए
महिला उन्नति संस्था (भारत) के संस्थापक डॉ राहुल वर्मा का कहना है, कृषि प्रधान देश में किसानों द्वारा अपनी मांगों को लेकर आन्दोलन करना बेहद चिन्ता का विषय है। अगर सरकार के कृषि से जुड़े तीनों कानूनों में किसानों को कोई आपत्ति है तो सरकार को उसका समाधान करना चाहिए और इस किसान आन्दोलन को समाप्त करने के प्रयास करना चाहिए। सरकार यह प्रयास कर भी रही है लेकिन कुछ आपराधिक तत्वों द्वारा आन्दोलनरत किसानों को देशद्रोही, खालिस्तानी आदि कहकर उन्हें बदनाम किया जाता रहा है। शायद यही कारण है कि बात बनते-बनते बिगड़ जा रही है।
किसान अन्नदाता है। वह हमारा पेट भरता है, इसलिए उन्हे अपशब्द कहकर अपमानित नहीं करना चाहिये। इस कड़ाके की ठंड में लगभग 50 आन्दोलनरत किसानों की मौत हो चुकी हैं, जो बेहद दुखदायी है। सरकार जल्द इस समस्या के समाधान के लिए उचित माहौल बनाये और आन्दोलन को समाप्त कराए।
सरकार के पास कोई ठोस नीत नहीं
गाजियाबाद के डॉ सतीश भारद्वाज का कहना है, भारत सरकार द्वारा लाये गए कृषि कानूनों के विरुद्ध किसान भाइयों ने आंदोलन कर रखा है, किन्तु सरकार के कानों पर जूं नहीं रेग रही है। सरकार का इस तरह आनन- फानन में कृषि कानूनों का लाया जाना अपने आप में एक शक पैदा करता है। और वास्तव में सरकार चाहती भी यही है कि जिस तरह से वह हर चीज का प्राइवेटाईजेसन करती जा रही है ठीक उसी तरह सरकार की मंशा है कि चार-पांच साल में किसान भी पूंजीपतियों केअधीन होकर रह जाय। इसीलिए सरकार के पास किसानों की इस समस्या का समाधान करने के लिए समय और ठोस नीति नहीं है। वह महज लॉलीपॉप देकर उन्हें बहलाना चाहती है। सरकार अपने पक्ष में इन कानूनों को लेकर किसान के हित में जो भी तर्क दे रही है, वह सिर्फ और सिर्फ बेवकूफ बनाने की बात है।
मोदी सरकार अडिग, किसान हटने को तैयार नहीं
कृषि विशलेषक नई दिल्ली के सुभाष निगम ने कहा कि मोदी सरकार विपक्ष प्रेरित किसान आंदोलन की सियासत से जूझ रही है पर कृषि सुधारों और किसानों की आय दुगना करने हेतु बनाए गए तीनों कानूनों को वापस न लेने पर अडिग है। दूसरी ओर अपनी पकड़ ढीली होने से बेचैन किसान संगठन और कुछ विपक्षी नेतागण अपनी साख बचाने और अपना करोड़ों रुपये सालाना का भारी मुनाफा बंद हो जाने के डर से किसानों को अपना मोहरा बना रहे हैं।
सोशल मीडिया ने दिल्ली को घेरे आंदोलन किसानों की पोल खोल दी है जिससे आम आदमी की सहानुभूति पाने में वे नाकायामबा हो रहे हैं। उनकी विलासितापूर्ण मौज-मस्ती इस कंपा देने वाली ठंड में भी उन्हें आम आदमी का समर्थन नहीं दिलवा पा रही है। गरीबी से बेहाल किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है। जबकि इन आशीशान टेंटों में रहकर मेवे खीर पिज्जा बरगर खाने वाले और मसाज कराने वाले किसान आढ़ती प्रतीत हो रहे हैं।
अब 8 जनवरी को सरकार और लगभग 40 किसान नेताओं में पुन: वार्ता होगी। इसके बेनतीजा निकलने के असार हैं। इस आंदोलन का हश्र भी जेएनयू और साहीनबाग आंदोलनों की तरह होने की आशंका है। देशवासी तो केवल यह चाहते हैं कि हमारे अन्नदाता को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य मिले और उपभोक्ता को वाजिब दाम पर खाद्य पादार्थ।
सरकार को ईमानदारी से कोशिश करनी चाहिए
जिला कांग्रेस कमेटी गौतमबुद्धनगर के पूर्व महासचिव अनिल भाटी का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा कृषि सुधार के नाम पर लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर जिस तरह पिछले करीब 42 दिन से अन्नदाता शान्तिपूर्वक आंदोलनरत हैं, वह अपने आपमें बेहद महत्वपूर्ण है। इस बीच सरकार के साथ हुई आठ दौर की वार्ता में कोई आम सहमति न बन पाना निराश करता है, क्योंकि आंदोलनरत किसान इस कड़ाके की ठंड में भी अपनी मांगों को लेकर मोर्चे पर डटे हैं। वे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और न ही सरकार पीछे हटने को तैयार है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अब तक करीब 50 किसान आन्दोलन की भेंट चढ़ चुके हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
किसान जहां एमएसपी को गारन्टी कानून के तौर पर चाहते हैं, वहीं उन्हे मंडिया खत्म होने और कांट्रेक्ट फार्मिंग से होने वाले दुष्प्रभावों को लेकर भी चिन्ता है। सरकार कृषि बिल के समर्थन में पूरी ताकत लगा रही है मगर किसानों की चिंताओं का निराकरण कर पाने में सरकार पूरी तरह नाकाम है, जो कार्य बिल लाने से पूर्व सरकार को किसान संगठनों से बिल पर चर्चा करनी चाहिये थी उसमें वो विफल रही। जिस कारण यह आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता जा रहा है। अन्नदाता का अपनी मांगों को लेकर यूं धरने पर बैठना हमारे कृषि प्रधान देश के लिये शर्म की बात है। सरकार को जल्द से जल्द किसानों की समस्याओं का समाधान कर इस आन्दोलन को समाप्त करने की हर सम्भव ईमानदार कोशिश करनी चाहिए।
मोदी सरकार की मंशा साफ नहीं है
दादरी गौतमबुद्धनगर के समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य राहुल आर्यन का कहना है- केन्द्र सरकार ने कृषि कानूनों को देश के अन्नदाताओं के माथे पर थोपने का जो निर्णय लिया है, वह एकदम गलत है। संसार के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में कोई कल्पना नहीं कर सकता कि जिस देश की आय का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर है, वहां कृषि से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनों को सरकार बिना किसानों से चर्चा किए संसद में पास कर देगी।
किसान पिछले 42 दिन से इस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में कृषि के तीनों कानूनों के खिलाफ आन्दोलनरत हैं। इस बीच पचासों किसान शहादत दे चुके हैं लेकिन सरकार अपनी हठधर्मिता पर कायम है। एक तरफ सरकार किसानों से बातचीत करने की बात करती है तो दूसरी तरफ उसके मन्त्री और नेता आन्दोलनकारी किसानों पर देश से गद्दारी और विदेश से मदद लेने का आरोप लगाकर इस आन्दोलन को मिटा देना चाहते हैं। सरकार की मंशा साफ नहीं है। सरकार अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाना चाहती है। अगर सरकार ने हठधर्मिता नहीं छोड़ी तो समझ लीजिए कि वह इस देश के किसान आन्दोलन को चिंगारी को हवा दे रही है।


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