… और तब होगा नए भारत के उदय का सूत्रपात

कृष्णा द्विवेदी
आज रक्षा बंधन का त्योहार है। आशापूर्ण, पावन, उल्लासमय, सदियों से मनाते आये हैं हम इस महापर्व को और अनंत काल तक मनाएंगे। बहनों की खुशी का वर्ष भर में सबसे बड़ा त्योहार। यहां कुंवारी लड़कियों की बात नहीं हो रही है, उनकी रक्षा का पूरा दायित्व माता-पिता और पूरे परिवार का पुनीत कर्तव्य है। विवाह में लड़की की सुरक्षा और भरण-पोषण को निभाने के लिए उसका वर वचनवद्ध हो जाता है, फिर भाई से रक्षा की आवश्यकता क्यों पड़ी ?
दरअसल, हमारे पूर्वज बहुत बुद्धिमान और दूरदर्शी थे। उन्होंने यह परंपरा और त्योहार शायद यह सोचकर बनाया होगा कि मायके में अपना सर्वस्व त्याग कर जाने वाली लड़की ससुराल में भी कभी असुरक्षित महसूस न करे। इसलिए यह दायित्व पिता नहीं भाई को सौंपा गया। जिससे लड़की अपने बुढ़ापे तक बेफिक्र रहे और यह मान ले की यदि उसके साथ कभी भी किसी तरह का अन्याय हुआ तो उसके भाई समेत पूरा मायका उसके साथ खड़ा मिलेगा।
आज इस त्योहार में भी आत्मीयता कम औपचारिकता ज्यादा ही देखने को मिलती है। कोई भी बहन मात्र उपहार की भूखी नहीं होती है और न उस उपहार से उसकी जिंदगी की सारी आवश्यकतायें पूरी हो जाएंगी, कभी सोचा है कि छोटे-छोटे बच्चों को साथ लेकर गाड़ी बस में थकाऊ उबाऊ सफर कर वह मायके क्यों पहुँच जाती है ? क्योंकि वह जुड़ी रहना चाहती है अपने जन्म स्थान से, अपने बचपन की यादों और अपनी जड़ से। मायका ही तो होता है जिस पर हर औरत को अभिमान होता है तथा मायके के हिसाब से ससुराल में भी उसको मान-सम्मान और आदर मिलता है। उसको मान-सम्मान और अपनापन चाहिए होता है और अगर यह मिल जाये तो ससुराल की कोई भी दुःख तकलीफ उसको डिगा नहीं पाती है। यह वही बहन आई हुई होती है जो ससुराल में मिला हुआ दर्द हो या मायके का अजनबीपन, सब सह लेती है, मुँह नहीं खोलती है क्योंकि उसके कंधों पर दो परिवार की मान-मर्यादा और इज्जत का भार जो होता है। परन्तु तकलीफ तब होती है जब इकलौती बहन के घर भी कभी राखी बंधवाने भाई नहीं जाता है, उसे बुझे मन से बुलाया जाता है और पत्नी द्वारा नापसन्द साड़ी व सूट उस दिन बहन को चेप दिया जाता है, तब लगता है कि इतने प्यारे रक्त सम्बन्ध के रिश्ते में भी मात्र औपचारिकता ही बची है।
इसी समाज में बहुत बहनें ऐसी भी हैं जिनके कोई भाई नहीं है, कुछ के ऊपर उनके पति का हाथ और साथ नहीं है। सोचिये, उनकी रक्षा कौन करेगा। अगर वो असुरक्षित रह गईं तो ऐसे त्योहार मनाने का क्या अर्थ रह जाएगा? कुछ वर्षों पहले तक हर जगह ऐसी सोच थी कि अगर गांव कालोनी की किसी भी लड़की को वहां के या बाहर के किसी आदमी ने जरा सा अपशब्द बोल दिया हो तो उस लड़की और उसके परिवार के पक्ष में पूरा समाज आ जाता था। वहां यह बात कोई माने नहीं रखती थी कि वह किस जाति, धर्म या वर्ग की है, वह पूरे गांव की इज्जत मानी जाती थी पर अफसोस यह सोच भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
क्यों हर बहन सड़क पर अपने आप को असुरक्षित महसूस करती है, क्यों निर्भया जैसी घृणित घटनाएं बार-बार होती हैं। हम सबको इस तथ्य पर मनन करना होगा, सिर्फ रक्षा सूत्र बंधवाकर, मिठाई खाकर और उपहार देकर हमारे कर्त्तव्यों की इतिश्री नहीं हो सकती है। हे सत्य सनातन को मानने वालों, जिस दिन से मुसीबत में फंसी किसी अपरिचित बहन की सहायता के लिए कोई अपरिचित भाई यथासंभव प्रयास करता हुआ दिखने लगेगा और मनुष्य को मनुष्य से डर लगना बन्द हो जाएगा, तब समझ लेना नए भारत के उदय का सूत्रपात प्रारम्भ हो चुका है।
(लेखक चिंतक व समाजसेवी हैं।)

1 Comment

  1. TV and media completely washed out our culture. Now we become pure western. Such happening is only news for our society. We are loosing everything and still taking feel of richness by putting things on social media.

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