अजीब हाल है इस मुल्क का। आज के हालात को देखकर कौन कहेगा कि हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। पहले तब्लीगी जमातियों की लापरवाही और खुरापात, और अब लॉकडाउन तोडऩे की बड़ी साजिश! मंगलवार को मुंबई के बांद्रा रेलवे स्टेशन पर जो कुछ हुआ और जिस कदर हजारों लोगों का सैलाब उमड़ा, उससे कानून ही नहीं टूटा बल्कि लोगों की जान और जहान दोनों से खेलने की बू आती है। पुलिस को प्रवासी मजदूरों को हटाने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा। माना कि लॉकडाउन से गरीब-मजदूरों की जिन्दगी बेहाल हुई है। उनकी दो जून की रोटी छिन गई है, न लोग उन तक पहुंच पा रहे हैं और न सरकारी मदद-इमदाद पूरी तरह से मिल पा रही है। लेकिन तब्लीगी और बांद्रा के घटनाक्रमों से यह बात भी आइने की तरह साफ हो गई कि कुछ लोग आज भी इस मुल्क में ऐसे हैं, जो अपनी ही सरजमीं का बेड़ा गर्क करना चाहते हैं। इन जाहिलों को इतना भी नहीं पता कि ये खुद के तो दुश्मन हैं ही, अपने बीवी-बच्चों और उन तमाम लोगों की जान भी खतरे में डाल रहे हैं, जिनसे यह गुलशन गुलजार है। उनकी खुशबू से यह जहान महकता है। लानत है ऐसे लोगों पर और उनकी घटिया सोच पर!
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लॉकडाउन बढ़ाने की घोषणा महज अपनी सुरक्षा के लिए तो नहीं है। इससे सारा समाज सुरक्षित होगा। पूरा देश कोरोना वायरस जैसी महामारी से बचेगा। मुल्ला-पंडित, पीर-पैगांबर सभी तो समझा रहे हैं- घर में रहिए, सुरक्षित रहिए! फिर क्यों लॉकडाउन के नियम-कानून से हम खेल रहे हैं। कोरोना वायरस (कोविड-19) किसी जाति-विशेष और धर्म-संप्रदाय के लिए तो नहीं है, यह महामारी तो पूरी दुनिया पर कहर ढा रही है। यह सीधी-सी बात तुम्हारे भेेजे में कब आएगी?
भाजपा कह रही है- तब्लीगी जमातियों की वजह से कोरोना वायरस के मामले और बढ़े हैं। कांग्रेस का कहना है कि लॉकडाउन का वह समर्थन करती है, लेकिन बचाव से जुड़े बहुत से कदम सरकार ने देर से उठाए। मुल्क के रहबरों, यह वक्त सियासत करने का नहीं है। जब लोग मर रहे हैं, जिस मर्ज की हमारे पास कोई दवा नहीं है, उस महामारी में तो कम से कम हमारा उद्देश्य एक होना चाहिए- हर जरूरमंद को मदद। इस बीच केन्द्र सरकार ने ही नहीं, बल्कि कुछ राज्य सरकारों ने भी लॉकडाउन का पालन कराने के लिए और सख्ती से पेश आने का फरमान जारी किया है। बेशक आप सख्ती करिए सरकार! लेकिन उससे ज्यादा पूर्णबंदी से निहायत परेशान लोगों की समस्याओं का समाधान भी करिए।
आपको मालूम नहीं है जनाब! आपके कारिंदे आप तक आज भी सही रिपोर्ट नहीं पहुंचा रहे हैं। आप जो मदद-इमदाद दे रहे हैं, यह उनके तक तो पहुंच रही है जो आपके यहां रजिस्ट्रर्ड हैं लेकिन उनका कौन होगा जिनका कोई कोई घर नहीं है। किसी गली-कूंचे में सो जाते हैं। रेहड़ी-पटरी पर दुकाने लगाते थे। घूम-घूमकर खुमचा बेचते थे। रिक्शा-ठेला चलाकर बच्चों का पेट पालते हैं। उनकी कोई सूची नहीं बनी है। उन्हें किसी ने नहीं रजिस्ट्रर्ड किया है। आपका ध्यान उन तक भी जाना चाहिए, जो किराए के मकान में रहते हैं, जो बेरोजगार हो गए हैं, कल-कारखानों और फैक्टरियंा बंद होने से सडक़ पर आ गए हैं। कोर्ट-कचहरी में मजमून टाइप करते थे। छेाटे-मझोले समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पत्रकारिता करते हैं, कोई मदद नहीं कर रहा इन गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की। इसलिए लॉकडाउन की स्थिति में नियम-कानून तोडऩे वालों पर सख्ती करने के साथ-साथ इन जरूरमंदों को उससे ज्यादा अहमियत दीजिए।
रही बात बांद्रा रेलवे स्टेशन पर जो कुछ हुआ, उस मामले की जांच होनी चाहिए। प्रवासी मजदूरों की भारी भीड़ इक_ा होने के मामले में नवी मुंबई पुलिस ने विनय दुबे नाम के शख्स को हिरासत में लिया है। उस पर भीड़ को गुमराह करने का आरोप है। इसके अलावा मुंबई पुलिस ने 1000 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। गांव-घर जाने की सभी को छटपटाहट है, बीवी-बच्चों से मिलने की तड़प और भूख से बेहाल लोगों की पीड़ा भी समझी जा सकती है, लेकिन उन्हें भडक़ाने वाले जो असली मुजरिम हैं, समाज के उन दुश्मनों के चेहरे बेनकाब होने चाहिए।
(लेखक पत्रकार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।)


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