राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
-“महफिल-ए-मूंगफली” में शायर और कवियों ने पेश किए खूबसूरत कलाम
गाजियाबाद। अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान द्वारा आयोजित “महफिल-ए-मूंगफली” में नए साल और लोहड़ी का जश्न उत्सव पूर्वक मनाया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मौजूद श्रोताओं को एक से एक श्रेष्ठ रचना सुनने को मिली। कार्यक्रम अध्यक्ष अमरेंद्र मिश्र ने देश-दुनिया के ताजा हालातों पर तंज कसते हुए कहा कि साफ मन से बात करने का माहौल खत्म होता जा रहा है। पास से गुजरता हर शख्स एक दूसरे को संदेह से देखता है। खत्म हो रहे भाईचारे को साहित्य के जरिए ही महफूज़ कर रखा जा सकता है। हमें जिंदा रखने के लिए प्रेम के ढाई आखर ही काफी हैं।
सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित काव्य उत्सव को संबोधित करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि गीत, नवगीत जैसी विधाएं साहित्य से विदा होती दिखाई दे रही हैं। कहानी को बचाने को लेकर नई कहानी, अकहानी और समानांतर कहानी जैसे कई आंदोलन भी चले। जो अतीत के पन्नों में दर्ज होकर रह गए। लेकिन आप तभी बचेंगे जब रचेंगे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लेखक, पत्रकार और चित्रकार राजकमल ने कहा कि नवांकुरों के लिए लेखन फटाफट क्रिकेट या इंसटेंट चाय-कॉफी की तरह हो गया है। उन्हें झटपट नतीजा चाहिए। जबकि साहित्य की कई विधाओं में सक्रिय रहने के बावजूद उनका पहला कहानी संग्रह 47 साल की उम्र में आया था। उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने शब्दों की दुनिया बदल दी है। हमें भी इस प्रवाह के समानांतर चलना होगा। उन्होंने प्रेम को केंद्र में रख कर रचे गए दोहों पर जमकर वाहवाही लूटी। उन्होंने कहा “जीवन हवन विशेष है, प्रेम अनल जब होय, तन समिधा मन मंत्र सा, सांस आहुति होए।” “प्रेम फलक जब तुम हुईं, बिखरे हम जो रंग, कूंचा-कूंचा रच गया, तन मन बजे मृदंग।” “तुमसे ही घर सहर है, तुमसे ही घर शाम, तुम संग मिल कर ही लड़ा, जीवन का संग्राम।” सुप्रसिद्ध ईएनटी सर्जन डॉ. बृजपाल सिंह त्यागी ने अपने उद्बोधन में कहा कि अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान की पताका विदेशों में भी बखूबी फहरा रही है। आगामी 1 से 4 मई तक लंदन में होने वाले इंटरनेशनल कॉन्क्लेव में संस्था भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल रहेगी।
“महफिल-ए-मूंगफली” का आगाज करते हुए डॉ. माला कपूर ने फरमाया “नया साल आया, कोहरा भी लाया वो, अदरक की चाय से, लोहड़ी की बात चली। ढोली का ढोल बजे, सरसों का साग बने, मक्का की रोटी पर, मक्खन सी शाम चली। गुड़-गुड़ महकती सी, तिल-तिल सरकती सी, कविता की रेवड़ी ले, रात चली बात चली् कविताएं भी पेश हुईं, ग़ज़लें भी फरमाईं, ठंडक में गरमाई, महफिल-ए-मूंगफली।” संस्था के अध्यक्ष गोविंद गुलशन ने अपने शेरों “बात छिड़ गई अगर कहीं हिजाब की, आ गई ख्याल में रोशनी नकाब की। टूटने का दर्द फूल से ज्यादा है उसे, टूट कर जुदा हुई जो पंखुड़ी गुलाब की” पर जमकर वाहवाही बटोरी। कार्यक्रम में मशहूर शायर मासूम गाजियाबादी का जन्मदिन केक काटकर मनाया गया। उन्होंने फरमाया “दरो दीवार तक यूं ही नहीं पहुंचा मेरे हमदम, मैं वो छप्पर हूं जिसे सब ने उठाया है मिलकर।” “हथौड़ी और छेनी की जब चोटों से बचाओगे, तो सूरत देवता की पत्थरों को दे न पाओगे।” “तुझे बैसाखियां मंजिल तक तो पहुंचा देंगी मगर, तेरे कद का तारीख में चर्चा नहीं होगा।” नेहा वैद्य ने अपने गीत की पंक्तियों “घर में जो भी चीजें लाई किस्तों में, दर, दरीचा, घर की छत मुस्काई किस्तों में” पर भरपूर दाद बटोरी। इस अवसर पर सुभाष अखिल, आर. के. भदौरिया, आलोक यात्री, बी. एल. बतरा, इंद्रजीत सुकुमार, सुरेंद्र शर्मा, अरुण साहिबाबादी, गुरबख्श सिंह, विष्णु सक्सेना, मंजू कौशिक, गोविंद सरसिज, आशीष मित्तल ने भी काव्य पाठ किया। संचालन प्रवीण कुमार ने किया। इस अवसर पर सुशील शर्मा, रजनीकांत शर्मा, हीरेंद्र कांत शर्मा, प्रभा कमल सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।


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