फागुन आया द्वार पर ले होली के रंग।
बोला जीवन चार दिन
जी लो होली संग।
गावें रसिया साधु सब,
जीवन के दिन चार,
पूरी जीवन्तता से जियो
फिर न मिलें यह वार।
बचपन में एक भाल पर
लगा दिया था रंग,
अब पलाश सम दहकता
स्मृति में वह रंग।
अमराई में मंजरी और
घुंघरू संग चंग,
भांग कुयें में घोलते हैं
सब मिलकर एक संग।
हो ली माने हो चुकी
जो होनी थी मित्र,
प्रीति रंग संग रंग पर्व
अब अतीत के चित्र।
- मनोरंजन सहाय, जयपुर


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