शरद चन्द्र
यूं तो सभी चाहते हैं कि उनका समाज में सम्मान हो पर कायस्थ व्यक्तिगत सम्मान का लोलुप सदा रहा। इनमें इतनी केकड़ा वृत्ति है कि ये सदा स्व हिताय ही सोचते हैं। अपना भला हो बाकी लोग अपनी विरादरी के जैसे भी रहें, कोई उच्च पदस्थ कभी भला नहीं सोचा। पुराने लोग कहा करते थे कि कायस्थ कभी कायस्थ का भला नहीं कर सकता।
हमारे जो नामी नेता राजनीति में सूर्य की तरह चमके, उन्होंने सर्व समाज के हित की बात की। चाहे सुभाष चंद्र बोस, देशरत्न डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, डा० संपूर्णा नंद, साहित्य में मुंशी प्रेमचंद और राजनीति में रहे ज्योति बसु लम्बे काल तक मुख्य मंत्री रहे। उनके जाने के बाद उस पार्टी का वर्चस्व ही मृतप्राय हो चला। उड़ीसा में पटनायक परिवार एक दूसरे का प्रतिद्वंदी और अंतिम पटनायक नवीन पटनायक की भी आखिरकार कुर्सी छिन गयी।
ठाकरे परिवार बालठाकरे के जाने के बाद बिखर गया। उद्धव ठाकरे भी सत्ता तो पाये लेकिन उनकी ही पार्टी तोड़ दी गई और असली वारिस भी नहीं रह पाये। निर्विवाद शास्त्री जी भी अल्पकाल के लिए प्रधानमंत्री बने और देशहित में काम किया। उनके पुत्र हरिकृष्ण शास्त्री केंद्रीय मंत्री कांग्रेस में रहे। एक पुत्र अनिल शास्त्री कांग्रेस से अलग हुए वीपी सिंह की सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। सुनील शास्त्री उत्तर प्रदेश राज्य के कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे। बाद में राजनीति छोड़ दिए।
नजर उठाकर देखा जाय तो इक्का-दुक्का कोई खद्योत के समान मंत्री कायस्थ समाज का मिल जायेगा। लेकिन जो भी उच्च शिखर पर पहुंचे वो अपने दम पर पहुंचे, किसी कायस्थ समाज के दम पर नहीं। चाहे नौकरी हो या फिर चाहे राजनीति, जो भी चमके सर्व समाज के लिए कार्य किया। जो मेधावी परिश्रमी हुए या हैं, अपने उच्च पदों पर आसीन हुए या अब भी हो रहे हैं।
कायस्थों के संघ बनते हैं, स्वार्थ की भेंट चढ़ जाते हैं। मान-सम्मान लूटने के चक्कर में लड़ जाते हैं और बिखर जाते हैं। आज कायस्थ समाज देख रहा है राजनीति में अपनों का पिछलग्गूपन। हाशिये पर डाले जाते हुए भी। दरी बिछाकर राजनीति में और कुछ संघर्ष करते हुए जब कोई अच्छा कार्यकर्ता टिकट पाने के करीब पहुंचता है तो टपका कहीं से आकर टिकट पा जाता है और पदासीन हो जाता है। वह मेहनत करने वाला और पार्टी के लिए संघर्ष करने वाला चुपचाप कुंठित होकर रह जाता है।
कायस्थ एक हो जाओ! कैसे एक होंगे, जब अगुआ नेतृत्व ही नहीं बचा। जो छुटभइये संघ या संस्था बनाये हुए हैं, वे तू-तू मैं-मैं में जूझ रहे हैं। इसलिए सच यह है कि कायस्थ अपने दम पर बढ़ा है और बढ़ता रहेगा।
एक दूसरे की टांग खींचने वाले केकड़ों के टोकरे के ऊपर मछुआरे ढक्कन नहीं लगाते। वो जानते हैं कि एक निकलना चाहेगा तो दूसरा टांग फंसा देगा।
स्वहित त्याग जो सर्व समाज की भला सोचेगा, वही सफल होगा। कायस्थ महासम्मेलन होते हैं और समाप्ति के बाद मैं-मैं की लड़ाई में बिखराव शुरू होता है। ऐसे में कैसे पुनर्स्थापित होगी कायस्थ समाज के व्यक्ति की राजनीति में हस्ती, यह विचारणीय है।
(लेखक ऑल इण्डिया कायस्थ काउंसिल के राष्ट्रीय सचिव हैं।)


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