समीक्षा – जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
वैसे तो लोकप्रियता और पाठकीयता की दृष्टि से संजीव पालीवाल का नवीनतम उपन्यास ‘मुंबई नाइट्स’ ने एक नया आयाम स्थापित किया है, परंतु यह उपन्यास एक पारंपरिक क्राइम थ्रिलर से कहीं आगे जाकर समाज और व्यवस्था के उन रहस्यमय गलियारों में प्रवेश करता है, जिन्हें अक्सर साहित्य में उपेक्षित कर दिया जाता है। यह रचना एक ओर जहां रहस्य और रोमांच की परंपरा को मज़बूती से थामे रहती है, वहीं दूसरी ओर पाठक को आत्ममंथन की ओर भी प्रेरित करती है।
रोहित शेखर सिंह की हत्या-आत्महत्या की ख़बर और विशाल सारस्वत, शिखा शर्मा की मुलाकात के बहाने प्रारंभ इस कृति को संजीव पालीवाल की लेखनी ने गजब का कमाल किया है। उपन्यास में मुंबई महज पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक ऐसे चरित्र के रूप में प्रकट होती है जिसमे आकर्षण और आतंक, दोनों पहलू हैं। लेखक की कथा-शैली विभिन्न परतों के नैरेशन की उत्कृष्ट मिसाल है। उपन्यास की कहानी सीधी-सरल नहीं, बल्कि हर मोड़ पर नई परतें खोलती है।
उपन्यास रोहित शेखर सिंह की हत्या-आत्महत्या की तहकीकात करता है बल्कि मानव मन की गहराइयों, उसकी टूटन और व्यवस्था से जूझने की जद्दोजहद को भी अभिव्यक्त करता है। यहां अपराध कोई एक व्यक्ति नहीं करता बल्कि हमारे आस-पास की पूरी सामाजिक संरचना उसमें भागीदार होती है। हत्या केवल गोली से नहीं होती, बल्कि मानसिक और सामाजिक हिंसा के अनेक रूप इसमें उभरते हैं। गोली भी है, ग़म भी है, मौज भी है, मस्ती भी है और इस सबके रूप में क्राइम भी है। लेखक जिस संवेदनशीलता और सजगता के साथ इन स्थितियों को चित्रित करते हैं, वह उन्हें सिर्फ पत्रकार या कथाकार नहीं, एक प्रखर सामाजिक टिप्पणीकार बना देती है। एक सूक्ष्म-द्रष्टा बना देती है।
संजीव पालीवाल स्वयं को साहित्यिक लेखक मानने से भले कतराएं, परंतु ‘मुंबई नाइट्स’ की भाषा, बिंबात्मकता, चित्रण और संवेदनशील प्रवाह उनके इस दावे को अस्वीकार कर देती है। वर्णनात्मक कौशल ऐसा है कि हर एक दृश्य पाठक के सामने चलचित्र की भांति साकार हो जाते हैं। संवाद इतने यथार्थपरक और धारदार हैं कि वे न केवल पात्रों को गढ़ते हैं बल्कि उनकी आंतरिक वेदना और द्वंद्व को भी पाठक तक संप्रेषित करते हैं।
आमतौर पर क्राइम थ्रिलर एक रहस्य से शुरू होकर उसके समाधान तक पहुंचते हैं लेकिन ‘मुंबई नाइट्स’ इस रूढ़ि को तोड़ता है। यह उपन्यास केवल ‘कौन अपराधी है’ नहीं पूछता बल्कि यह ‘असली अपराधी क्या है? व्यक्ति, समाज, व्यवस्था या एक सोच?’ इसका भी प्रश्न उठाता है। सच कहूँ तो मुझे ‘मुंबई नाइट्स’ को पढ़ना एक उपन्यास पढ़ने जैसा नहीं एक यात्रा पर निकलने जैसा लगा।
पिछले दिनों गाँव में कुछ दिन रहना पड़ा और उस गृह-वास में मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसको पढ़ना ऐसी यात्रा है जिसमें पाठक सपनों के शहर की धुंध और अंधकार में चलने को विवश होता है। यह कृति भारतीय थ्रिलर लेखन को केवल रोमांच से निकालकर एक गहरी संवेदना और सामाजिक विवेक के दायरे में ले आती है। संजीव पालीवाल ने इस उपन्यास के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि क्राइम कथा भी साहित्यिक हो सकती है, बशर्ते उसमें केवल हत्या नहीं, विचारों का संघर्ष और भावनाओं का द्वंद्व भी हो। यह उपन्यास प्रेम, प्रकृति, विछोह, मोह, अहंकार, अराजकता क युक्त आज के भारत की वह तस्वीर दिखाता है जिसे देखना अक्सर असहज होता है लेकिन आवश्यक भी।

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