खतरे में देवभूमि व हिमाचल, दरक रहे पहाड़

लेख : डॉ. चेतन आनंद, गाजियाबाद।


हिमालय को विश्व की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला कहा जाता है। इसकी भूगर्भीय संरचना अभी स्थिर नहीं है, यही कारण है कि यह क्षेत्र लगातार भूकंपीय गतिविधियों और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता है। देवभूमि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश, जो हिमालयी राज्यों का अहम हिस्सा हैं, आज अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे हैं। यहां के पहाड़ दरक रहे हैं और जमीन धंसने की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन पहाड़ों का कितना हिस्सा असुरक्षित है और यह खतरा किन-किन रूपों में सामने आ रहा है?
प्रभावित जिले :
किसी भी राज्य के पूरे भौगोलिक क्षेत्र को “असुरक्षित” कहना सरल नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन हमें स्पष्ट संकेत देते हैं कि स्थिति बेहद गंभीर है। उत्तराखंड-वाडिया इंस्टीट्यूट और विभिन्न भू-वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, राज्य का लगभग 51 प्रतिशत क्षेत्र उच्च और बहुत उच्च भूस्खलन संवेदनशील क्षेत्र में आता है। यानी हर दूसरा इलाका असुरक्षित माना जा सकता है। मसूरी, चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल जैसे जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
हिमाचल प्रदेश-यहां का किन्नौर जिला और सतलुज घाटी भूस्खलन के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माने गए हैं। शिमला, कुल्लू और चंबा के कुछ हिस्सों को भी उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रखा गया है।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य-भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की रिपोर्टों के मुताबिक, भारत का लगभग 12.6 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन-प्रवण है। अगर केवल हिमालयी पट्टी देखें, तो यह प्रतिशत और भी अधिक हो जाता है। विशेष जिलों की स्थिति-इसरो की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल देश के सबसे ज्यादा असुरक्षित जिलों में शामिल हैं।
खतरे की प्रमुख वजहें :
1-भूगर्भीय अस्थिरता और भूकंपीय सक्रियता-हिमालय अभी भी “बढ़ते हुए” पहाड़ हैं। प्लेट विवर्तनिकी के चलते यह क्षेत्र लगातार दबाव में है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखंड और हिमाचल दोनों “भूकंप ज़ोन 4 और 5” में आते हैं। छोटे-मोटे झटके अक्सर आते रहते हैं और एक बड़े भूकंप का खतरा हमेशा बना रहता है।
2-जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों का पिघलना-ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहां के ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) की घटनाएं बढ़ रही हैं। वर्ष 2021 में चमोली जिले में आई आपदा इसका उदाहरण है, जिसने सैकड़ों लोगों की जान ली और कई परियोजनाओं को बहा दिया।
3-अंधाधुंध निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन-चारधाम सड़क परियोजना, सुरंगें, जलविद्युत परियोजनाएं और होटलों का अनियंत्रित निर्माण पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। मसूरी, नैनीताल, शिमला और मनाली जैसे पर्यटक स्थलों पर “कैरिंग कैपिसिटी” से कई गुना ज्यादा दबाव है। इससे पहाड़ दरक रहे हैं और जमीन धंसने की घटनाएं (जैसे जोशीमठ में) सामने आ रही हैं।
4-वनों की कटाई और जलस्रोतों का सूखना-जंगलों की अंधाधुंध कटाई से पहाड़ों की मिट्टी कमजोर हो गई है। जलस्रोत सूख रहे हैं और पारिस्थितिकी का संतुलन बिगड़ रहा है। खेती योग्य भूमि सिकुड़ रही है और ग्रामीण पलायन कर रहे हैं, जिससे “भूतिया गांवों” की संख्या बढ़ रही है।
विशेषज्ञों की चेतावनी :
प्रो. वीके जैन (आईआईटी रुड़की, भू-विज्ञान विभाग) का कहना है-“हिमालयी राज्यों में विकास की रफ्तार प्रकृति की गति से कहीं ज्यादा है। यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से अभी स्थिर नहीं है। यदि निर्माण कार्यों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो अगले दशक में कई शहर असुरक्षित हो जाएंगे।” वाडिया इंस्टीट्यूट, देहरादून की रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के 51 प्रतिशत इलाके में भूस्खलन का गंभीर खतरा है। संस्था के वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो आने वाले सालों में आपदाएं और घातक रूप ले सकती हैं। वहीं इसरो के अध्ययन (2023) में पाया गया कि रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल देश के शीर्ष 10 भूस्खलन-प्रवण जिलों में शामिल हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि लगातार बढ़ता पर्यावरणीय दबाव इन क्षेत्रों को “आपदा हॉटस्पॉट” बना रहा है। पर्यावरणविद् अनिल जोशी का कहना है, “हिमालय केवल पहाड़ नहीं हैं, यह हमारी नदियों का उद्गम स्थल है। यदि यहां संतुलन बिगड़ा, तो इसका असर पूरे उत्तर भारत की जल-व्यवस्था पर पड़ेगा।”
खतरे वाले प्रमुख क्षेत्र :
उत्तराखंड
1-जोशीमठ (चमोली)-जमीन धंसने की घटनाओं से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय।
2-रुद्रप्रयाग और टिहरी गढ़वाल-चारधाम यात्रा मार्गों पर सबसे ज्यादा भूस्खलन।
3-मसूरी और आसपास-लगभग 15 प्रतिशत क्षेत्र उच्च संवेदनशील।
4-उत्तरकाशी और पौड़ी गढ़वाल-लगातार भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं।
हिमाचल प्रदेश
1-किन्नौर-बड़े पैमाने पर भूस्खलन और सड़क दुर्घटनाएं।
2-सतलुज घाटी-जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क चौड़ीकरण से अस्थिर इलाका।
3-शिमला-कुल्लू-चंबा क्षेत्र-पर्यटन दबाव और निर्माण के कारण असुरक्षा बढ़ रही है।
निष्कर्ष और समाधान :
उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ आज जिस असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, वह केवल प्राकृतिक नहीं बल्कि मानवीय हस्तक्षेप से भी उपजी है।
क्या करना ज़रूरी है :
1-अनियंत्रित निर्माण और बड़ी परियोजनाओं पर रोक लगानी होगी।
2-स्थानीय स्तर पर छोटे पैमाने की ऊर्जा और सड़क योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी।
3-कैरिंग एंड कैपेसिटी के हिसाब से ही पर्यटन को सीमित करना होगा।
4-आपदा पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत बनाना होगा।
5-स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना होगा।

Dr. CHETAN ANAND


संकट और भयावह हो सकता है :
हिमालय हमारे लिए केवल पर्यटन या प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल है। यदि हमने समय रहते संतुलन नहीं साधा, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संकट और भी भयावह हो सकता है। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि उत्तराखंड का करीब आधा हिस्सा और हिमाचल के महत्वपूर्ण जिले (किन्नौर, सतलुज घाटी, शिमला-कुल्लू बेल्ट) असुरक्षित स्थिति में हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि विकास का वर्तमान मॉडल बदला नहीं गया, तो अगले दस वर्षों में इन पहाड़ों का बड़ा हिस्सा आपदा-ग्रस्त घोषित करना पड़ सकता है।
(लेखक कवि व पत्रकार हैं।)

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