पुण्यतिथि पर साहित्यिक अवदान के लिए याद किए गए से. रा. यात्री

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। विख्यात लेखक से.रा. यात्री की पुण्यतिथि पर आयोजित ‘कथा संवाद’ को संबोधित करते हुए वरिष्ठ लेखक विवेक मिश्र ने कहा कि साठ से सत्तर का दशक नई कहानी की स्थापना का दौर था। स्वतंत्रता के बाद देश विकास की ओर अग्रसर था, जहां चिंतक और लेखक समय और परिवेश को अपनी तरह से दिशा देने का काम कर रहे थे। उस दौर में से. रा. यात्री और उनके समकालीन रचनाकारों ने समाज और साहित्य को अपनी-अपनी तरह से विकसित और समृद्ध किया। वरिष्ठ लेखक विपिन जैन ने कहा कि मध्यम और निम्न मध्यवर्गीय जीवन के जिस यथार्थ को यात्री जी ने प्रस्तुत किया है वह साठोत्तरी पीढ़ी के कम ही रचनाकारों में दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि से. रा. यात्री नि:संदेह जनसामान्य के संघर्ष और पीड़ा के संवाहक थे।
नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित ‘कथा रंग’ के ‘कथा संवाद’ को संबोधित करते हुए कार्यक्रम अध्यक्ष विवेक मिश्र ने कहा कि कहानी क्यों और कैसे लिखी जाए, इसका निर्धारण ऐसी कार्यशालाओं में ही होता है। उन्होंने कहा कि विचार आपको खुला आसमान और बड़ी जमीन प्रदान करता है। यह लेखक पर निर्भर करता है कि वह इस फलक का कितना और किस तरह उपयोग करता है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध लेखक संदीप तोमर ने कहा कि लेखक को अपने समय की नब्ज को पकड़ना चाहिए। प्रवचन की मुद्रा में लिखी कहानी लेखक के भटकाव का उदाहरण बन कर रह जाती है।
सुप्रसिद्ध रचनाकार एवं शिक्षाविद डॉ. माला कपूर ‘गौहर’ ने कहा कि उन्हें से. रा. यात्री की मानस पुत्री होने के साथ-साथ उनकी विरासत संभालने का दायित्व भी मिला है। उन्होंने कहा कि एक दौर था जब पाठक पुस्तकों की ओर दौड़ता था, आज के दौर में पाठक जब पाठक पुस्तकों से विमुख हो रहा है तो हमें पुस्तकों और पाठक के बीच एक नए सेतु के निर्माण के बारे में गंभीरता से सोचना होगा‌। वरिष्ठ लेखक सुभाष चंदर ने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि हमने एक लंबा दौर से. रा. यात्री और उनकी रचनाप्रक्रिया के साथ व्यतीत करते हुए, इस बात को आत्मसात किया है कि लेखन में जल्दबाजी जैसा कोई कृत्य नहीं होता। उन्होंने कहा कि रचनाकार को रचना के परिपक्व होने तक प्रतीक्षा करनी चाहिए।
वरिष्ठ लेखक विपिन जैन ने यात्री जी की रचनाप्रक्रिया पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कहानी और किस्सागोई का संबंध कमीछ और नेकर जैसा है। उन्होंने कहा कि यात्री जी जितने सिद्ध लेखक थे, उतने ही सिद्ध किस्सागो भी थे। कार्यक्रम का संचालन लेखिका एवं संपादक डॉ. स्वाति चौधरी ने किया। संस्था के संरक्षण डॉ. अशोक मैत्रेय ने कहा कि आपकी कहन में विषय, परिवेश, भाषा और काल का समन्वय और संतुलन महत्वपूर्ण है।
इस अवसर पर विनय विक्रम सिंह की कहानी ‘आस्तीन का सांप’ और मनु लक्ष्मी मिश्रा की कहानी ‘बेला’ पर हुए विमर्श में अवधेश श्रीवास्तव, अनिल शर्मा, पंडित सत्यनारायण शर्मा, डॉ. अजय गोयल, सुरेंद्र कुमार अरोड़ा, डॉ. बीना शर्मा, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, संजीव शर्मा ने विचार व्यक्त किए।कार्यक्रम के संयोजक आलोक यात्री ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में ईश्वर सिंह तेवतिया, वागीश शर्मा, दीपक कुमार श्रीवास्तव ‘नीलपद्म’, हेम कृष्ण जोशी, आशु गोस्वामी, राष्ट्रवर्धन अरोड़ा, संदीप वैश्य, इंदर कुमार, तुलिका सेठ, राजीव शर्मा, योगेश दत्ता, प्रभात चौधरी, उत्कर्ष गर्ग सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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