वो ज़िंदगी दोबारा मिलेगी?

बाएं से - लेखक श्री सत्येन्द्र प्रकाश व अन्य

लेख – सत्येन्द्र प्रकाश / राष्ट्रीय जनमोर्चा
आज बात आधी सदी से भी पहले यानी बचपन के गांवों की। बाल सुलभ कृत्यों की, भावों की। हालांकि बेहिचक साभार कहूंगा कि ये गंवईपन एक दोसइया (दोस्त) के वॉट्सएप सनेस (संदेश) से करेजा (दिल) भीतर उमड़-घुमड़ झूमा है। तभी मा- बदौलत का कूढ़ मगज (बुद्धू दिमाग़) एहि ओर (इस तरफ़) घूमा है।
अच्छा चलिए अब शुरू करते हैं असली बात। आप सब ने शायद सुना/पढ़ा होगा: ‘चूरन खाते एडिटर जात जिनके पेट पचे नहि बात’ तो उसी आदत के मुताबिक बात आगे बढ़ाता। मोटर वाहन के जमाने में बैलगाड़ी पर चढ़ाता हूँ।
क्या आपने बखरी, कोठरी, घिरचुन, ताखा सुना है। उसमें जलती ढेबरी की धीमी-धीमी लौ देखा है। दलान / बैठका को बैपरा/ जाना-समझा है। ओसारा जानते हैं, वहां बैठ के तपता (कौड़ा) तापा है। दुआर पर खटिया मोढ़ा पर जमी कचहरी (पंचायत) देखी है। सुबू-सबेरे दतुअन कूंचते दूसरे के दुआरे पहुंच, कुआं के जगत पे पानी-कुल्ला किये हैं। जैरामजी की, पायलागी, सलाम बोल के चाह-चुक्कड़ पिये हैं, चबैना चबाए हैं। उससे पहले भोरे- भोरे कलेवा काटा है। दिन-दुपहरिया में दाल-भात-तरकारी खाये हैं। संझा (संध्या) माई की किरिया (कसम) का मतलब समझते हैं। संझौती में दीया और लालटेम लेसने (जलाने) का काम किया है। गाँव की सीमा के बरम बाबा के स्थान पर माथा टेके हैं। डीह बाबा का गोड़ धरे हैं। हर (हल), ज़ुआठ, बरधा (बैल) देखे/ सुने हैं, जिनके बदौलत घर अन्न से टन्न होता था।
तलाव (ताल) के किनारे और बगइचा के बगल वाले पीपर और स्कूल के रस्ता वाले बरगद के भूत का किस्सा सुने हैं। बढ़ई जानते हैं जो घर के किवाड़ से लेकर गोंइड़ (घर के पास का खेत) जोतने में काम आने वाले लकड़ी के सामान बनाता था। बसुला समझते हैं। फरुहा जानते हैं। कांधे कुदार धरे हैं/देखे हैं।
दुपहरिया में घूम-घूमकर आम, जामुन, अमरूद, बैर, बरकटा (जंगली बेर), जंगल जिलेबी, इमली खाये हैं। भैंस पे बैठे हैं, उसपर बैठ के गोरू (ढोर, डांगर, मवेशी) चराए या चराता हुआ चरवाहा देखे हैं। बारी बगइचा की जिंदगी जिये हैं। सिया पट्टी (पेड़ पर चढ़ने -उतरने का खेल) का मज़ा लिये हैं। चिलचिलाती धूप के साथ लूक (लू) के थपेड़ों में बाग में खेले हैं। पोखरा-गड़ही किनारे बैठकर लंठई / बकैती किये हैं। खेत में बैठकर 5-10 यारों की टोली के साथ बतियाते हुए कुल्ला-मैदान (मल- त्याग) गये हैं। कच्चा गोहूं, अरहर, मटर- छीमी, चना (होरहा) का मजा लिये हैं।
अगर आपने जेठ के महीने की तीजहरिया में तीसौरी भात खाये हैं, अगर आपने सतुआ का घोरुआ पिआ है, टिकोरा की चटनी के उंगली चाट-चाट खाया है। अगर आपने बचपन में बकइयां घींचा है। अगर आपने गाय को रंभाते, भैंस को पगुराते हुए देखा है। अगर आपने बचपने में आइस-पाइस, ढूकल-मूकल (लड़के-लड़की साथ) खेला है। फ्रेम के अंदर से एक पैर डालकर कैंची सायकिल चलाई है। अगर आपने मवेशियों को लेहना और सानी-भूसा खिलाया है या खिलाते किसी को देखा है। अगर आपने ओक्का बोक्का तीन तलोक्का नामक खेल खेला है। लड़कियों को चिट्टी-गुट्टी खेलते देखा है, गेंदतड़ी, गुल्ली-डंडा खेला है। अगर आपने पिंडोर मिट्टी से घर पोतते, गोबर से कोठरी अंगना/बेदी दुआर लिपते हुए देखा है। अगर आपने पोतनहर से चूल्हा पोतते हुए देखा है। अगर आपने कउड़ा/कुंडा/ सिगड़ी/ कंडा तापा है, भूनी आलू, गंजी (शकरकंदी) मटर, गरम गुर और ऊख (गन्ना) चुहने (चूसने) उसके कोल्हू में पेरे रस का मज़ा लिया है। कुदारी से खेत का कोन गोड़ने का आनंद उठाया है। अगर आपने दीवाली या डिठवन (देवोत्थानी एकादशी) के बाद मुँहअंधेरे भिनसार (ब्रह्म मुहूर्त) में ‘ईसर आवैं दलिद्दर जाय’ बोलते हुए घर की आजी (दादी) अम्मा काकी चाची को दलिद्दर खेदते (भगाते) देखा है।
इस सबके साथ अगर आपने ये आज के लिए अद्भुत (जो उस समय सामान्य थी) जिंदगी ख़ूब जी है। मतलब, बाप के खदेड़ने पे माई के लूगा में छुपे हैं, पर अकेले में जी भर उसकी मार खाई, डांट पी है।
तो समझिये कि आपने एक अनोखी ज़िंदगी जी है और इस युग में ये अलौकिक ज़िंदगी न अब आपको मिलेगी न आपके बच्चों को; और आने वाली पीढ़ी के लिए, तो असंभव सी है, क्योंकि आज उपरोक्त चीज़ें विलुप्त प्राय होती जा रही हैं या हो चुकी हैं।
तो यह मुक्तक शायद आपको मौजूं लगे क़रीब ढाई दशक पहले लिखा गया था:
“सारे नियम- उसूल ज़ार- ज़ार रो रहे,
ईमान – मेल – प्रेम तार – तार हो गए।
सोचा! कि चलें गांव, छांव-ठौर मिलेगी
अफ़सोस है कि गांव सब बाज़ार हो गए।”
और इसकी वजह आपको मेरे इस शे’र में दिख सकती है:
“देखिए गांव अब मुरझाने लगे हैं ;
युवा पाँव यहां से जब जाने लगे हैं।
(लेखक साहित्यकार व पत्रकार हैं।)

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