मैं गंगा हूं! अगर मेरा लोप हुआ तो तुम्हारा भी अंत निश्चित है

कृष्ण द्विवेदी
मैं गंगा हूं, परमपिता ब्रह्मा के कमंडल से निकली उनकी पुत्री हूं मैं। देवराज इंद्र की सभा में राजा महाभीषक के साथ अपने पिता द्वारा मैं शापित हुई। फलस्वरूप मुझे इस धरा धाम पर आने का शाप मिला। महाराजा भगीरथ के अथक प्रयास एवं भूतभावन भोलेनाथ की सहायता से मेरा अवतरण हुआ। गंगोत्री से देव प्रयाग तक मुझे भगीरथी कहा जाता है और उसके आगे मैं गंगा कही गई। चंद्रवंशी महाप्रतापी राजा शांतनु की महारानी एवं सातों वसुओं समेत देवव्रत अर्थात भीष्म पितामह की जननी होने का गौरव भी मुझे प्राप्त है।
इस भारत भूमि पर मैंने गंगोत्री से गंगा सागर तक लगभग 2500 कि.मी. की यात्रा तय की है। मैंने अपना मार्ग स्वयं बनाया। ऋषियों- मुनियों और भक्तों के लिए मैं सदैव गंगा मैया और मां गंगे ही रही पर अन्य के लिए सिर्फ गंगा। मेरे जल को कभी पानी नहीं कहा गया। गंगा जल अमृत तुल्य, स्वच्छ, निर्मल और रोग विनाशक गंगाजल। हजारों वर्षों से लाखों श्रद्धालुओं ने हमारी पवित्र जल धारा में स्नान कर, सूर्यार्घ्य देकर एवं आचमन कर अपने को धन्य माना। मरणासन्न व्यक्ति भी अपने मुंह में दो बूंद मेरा जल डालकर संतुष्ट हुआ और समस्त पापों से मुक्त होने में विश्वास रखता है।
विश्व के पौराणिक सभ्यताओं में एक तुम्हारी सभ्यता भी है जो मेरे तट के किनारे विकसित हुई है। ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कानपुर, प्रयाग और आदिदेव शिव की नगरी काशी हमारे ही तट पर बसी हैं। मेरे तट पर बसे सैकड़ों औद्योगिक एवं धार्मिक छोटे-बड़े नगरों को मैंने सहेजा और पाला है। मेरा दो-आबा भारत के सबसे उपजाऊ क्षेत्र में पहला स्थान रखता है। विश्व के किसी बड़े से बड़े विभाग से ज़्यादा रोज़ी-रोटी मैं ही देती हूं। मां हूं न मैं, इसलिए करोड़ों बच्चों की जीविका का साधन हूं। मेरे तट पर जो जिस नियत और भाव से आया, मैंने पूरा किया है। हमारे विश्वास को तुम लोगों की आत्मा ने इतना आत्मसात किया है कि अगर लड़के का नाम गंगादीन, गंगा प्रसाद और गंगाधर रखा तो लड़की का नाम भी गंगा देवी रखा है।
मां हूं, कभी तुम लोगों से मैंने कुछ नहीं मांगा। तुमने जैसा व्यवहार किया, सहन करती गई पर अब मेरी भी शिकायत है। तुमने मुझे मां से नदी और मेरे जल को पानी बना दिया। औद्योगिक और निवासीय कूड़ा-कचरा इतना डाल रहे हो कि मैं पतितपावनी होते हुए खुद को कैसे साफ रखूं। तुम्हारे विषैले नालों से हमारे अंदर पलने वाले हजारों प्रकार के जीव एवं रंग-बिरंगी मछलियां समाप्त हो गईं। आज हमारे जल को पीने के लायक तो छोड़िए, नहाने लायक भी तुमने नहीं रखा। छी: अपनी मां को कोई इतना गन्दा रखता है, क्या?
ध्यान रखो, जिस दिन मैं सूख गई, तुम्हारी सभ्यता का भी शनै: शनै: अंत हो जायेगा। करोड़ों लोगों के सामने आजीविका का ज्वलंत प्रश्न किसी पिशाच की तरह मुंह बाये खड़ा हो जायेगा। अगर मेरा लोप हुआ तो तुम्हारा भी बहुत कुछ लोप हो जायेगा। अगर तुम अपनी पीढ़ियों पर कुछ रहम करना चाहते हो तो पहले मेरे ऊपर रहम करो। परमपिता तुम्हें सद्बुद्धि दें, क्षमा करें एवं सदैव तुम्हारा कल्याण करें।

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