किसान आंदोलन: हंसकर मानना या रोकर

kisaan aandolan: hansakar maanate hain ya rokane vaale
दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलनकर्मियों के बीच मौजूद रवि अरोडा

रवि अरोड़ा
नई दिल्ली। सिंधु बोर्डर पहुँचते ही किसी अनजान आदमी ने हमारे हाथ में खीर भरा एक डोंगा थमा दिया। थोड़ा आगे बढ़े तो एक जगह गर्मागर्म पकोड़े बँट रहे थे। हाथ जोड़कर किए गए अनुरोध पर वे भी जीम लिये। आगे भी पॉपकॉर्न, गोलगप्पे, बर्गर, चाय-बिस्कुट, दूध, जलेबी, हलवा, छोले-चावल, आलू-पूरी जैसे अनेक स्टाल मिले। दाल-रोटी व सब्ज़ी वाले तो अनगिनत नज़र आये। किसी के भी पास से गुज़र जाओ तो वह आपसे खाने का कुछ ऐसे अनुरोध करेगा जैसे गुरु पर्व पर छबीलों पर मीठा जल पिलाया जाता है। चलते-चलते थक गये मगर खाने-पीने की चीज़ें दिखनी बंद नहीं हुईं। एक तिपहिया में बैठे तो कोई ज़बरन हाथ में लड्डू ही थमा गया। इसके बाद तो क्षमा की मुद्रा में हाथ ही बाँधने पड़े और जैसे ही कोई कुछ खाने-पीने का अनुरोध करता, मुआफ़ी को वही जुड़े हाथ उसके आगे कर दिये।
पारिवारिक पृष्ठभूमि सिख क़ौम से जुड़ी है अतः इस धर्म को मैं भलीभाँति समझता हूँ। इसके गुरुओं ने वंड छको यानि मिल-बाँटकर खाने, संगत-पंगत, लंगर और दसवंत यानि आमदनी का दसवाँ हिस्सा समाज पर लगाने की जो सीख दी थी, उसका दामन इस क़ौम ने आज तक नहीं छोड़ा है। दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे एतिहासिक किसान आंदोलन में सेवा का जो यह भाव दिखा, वही सिख धर्म है। सैंकड़ों वर्षों से दुनिया भर के लाखों गुरुद्वारों में जो काम यह क़ौम कर रही है वही काम वह अब किसान आंदोलन में भी कर रही है, यानि निष्काम सेवा। तभी तो कोई कपड़े धो रहा है तो कोई जूते पालिश कर रहा है। कोई मुफ़्त खिला पिला रहा है तो कोई कई किलोमीटर लम्बे धरनास्थल पर मुफ़्त सवारियाँ ढो रहा है। जिसे रोटी बनानी आती है वह रोटी बना रहा है और जिसे केवल गुरुबाणी का पाठ करना आता है तो वह वहाँ वही कर रहा है।
किसान आंदोलन में पंजाब के किसान यानि बड़े भाई को सिंघु बोर्डर पर यह सब करते देख हरियाणा के किसान यानि छोटे भाई भी उसी रंग में रंग गए और उन्होंने न केवल टीकरी बोर्डर पर यही सब कर दिखाया, बल्कि सिंघु बोर्डर पर भी सब्ज़ियों और दूध-दही की कोई कमी नहीं होने दी। हालाँकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की यह संस्कृति नहीं मगर किसी से पीछे रहने को वे भी तैयार नहीं, अतः ग़ाज़ीपुर बोर्डर पर भी खाने-पीने के तमाम सुख हैं।
पंजाबियों की तर्ज़ पर वे भी राह चलते को रोक-रोककर खिला-पिला रहे हैं। सिंघु बोर्डर पर देश-दुनिया के गुरुद्वारों व सिख संगठनों द्वारा जो सेवा की जा रही है टीकरी पर वह काम हरियाणा के जाटों की खापें तथा ग़ाज़ीपुर बोर्डर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का समृद्ध किसान कर रहे हैं। बेशक तीनों संस्कृतियाँ अलग-अलग हैं और उनकी मान्यताएँ व परम्पराएँ भी मेल नहीं खातीं मगर किसान हित के नाम पर गंगा-यमुना-सरस्वती का यह अनूठा संगम नमूदार हुआ है। वक़्त बताएगा कि इस अनूठे संगम पर आने वाले वक़्त में कितनी पीएचडी होंगी।
पता नहीं क्यों सरकार इसे सामान्य किसान आंदोलन ही मानकर चल रही है। जबकि साफ़ नज़र आ रहा है कि यह अब धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन भी हो चला है। ऊपरी तौर पर खेती-किसानी से जुड़े मुद्दे ही इस आंदोलन में छाये हुए हैं मगर बात केवल इतने भर पर रुकने वाली नहीं है। यदि यह आंदोलन सफल हुआ तो यक़ीनन देश की दशा और दिशा पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा और खुदा न ख़ास्ता यह असफल हुआ तब भी इसकी छाप आने वाले वक़्त पर बहुत गहरी पड़ेगी। गाँव पर शहर, खेती पर उद्योग, वंचित पर समृद्ध और मजलूम पर ताक़तवर को तरजीह की राजनीति को इस आंदोलन ने वो झटका तो दे ही दिया है कि अब कोई तानाशाह बहुसंख्य के हितों से यूँ ही कोई इकतरफ़ा समझौता तो नहीं कर पाएगा। मेरी बात पर आपको यक़ीन नहीं तो कुछ घंटे और रुक जाइये। 26 जनवरी को किसानों के ट्रैक्टर मार्च के बाद तो आपको भी यह बात माननी ही पड़ेगी। हंसकर मानना या रोकर।

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