आंदोलन के नाम पर अराजकता, लोकतंत्र पर धब्बा

jitendra bachchan
संपादकीय पृष्ठ पर छपा लेख

जितेन्द्र बच्चन
गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में किसान आंदोलनकारियों ने जो कुछ किया, वह हैरान करने वाला है। सभ्य और लोकतांत्रिक समाज के लिए भयानक और शर्मनाक घटनाक्रम। आंदोलनकारी ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कर लाल किले के गेट पर पहुंच गए। हिंसा पर उतारू सैकड़ों उपद्रवियों ने कब्जा कर तिरंगे के बगल में अपना झंडा लहरा दिया। अपने ही देश की इस आन-बान और शान को शर्मिंदा होना पड़ा। जिन हाथों की हुंकार से दुश्मन थर्रा उठता है, उन्हीं हाथों ने 72वें गणतंत्र के जश्न पर तिरंगे का अपमान किया। किसान आंदोलन के कार्यकर्ता हिंसा और हंगामे पर उतर आए। किसान नेताओं ने जो बड़े-बड़े वादे और दावे किए थे, टूट गए और उनके दावों की पोल खुल गई। भरोसे का खून कर दिया।
दिल्ली पुलिस ने तमाम आशंकाओं के बावजूद जरूरी शर्तों के आधार पर कुछ खास रूटों पर 26 जनवरी को किसानों को ट्रैक्टर रैली निकालने की अनुमति दी थी। यह रैली 12 बजे निकलनी थी, लेकिन हालात सुबह से ही बेकाबू होने लगे। किसान नेताओं द्वारा किए गए सारे वादे और दावों को रौंदते हुए रैली 12 बजे से पहले ही सुबह आठ बजे निकाल दी गई। पुलिस बैरिकेड तोड़ते हुए ट्रैक्टर सेंट्रल दिल्ली की तरफ दौड़ा दिए गए। अक्षरधाम, नोएडा मोड़, गाजीपुर बॉर्डर, आईटीओ और नागलोई में पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो उन पर आंदोलनकर्ताओं ने लाठी-डंडे और पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। आखिरकार पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और भीड़ को तितर-वितर करने के लिए आशूगैस के गोले भी दागे।
मंगलवार के इस हिंसक प्रदर्शन में 86 पुलिसकर्मी घायल हो गए। नियम-कानून, मान-मर्यादा की धज्जियां उड़ाते हुए कई किसान और उनके आंदोलनकर्मी भी जख्मी हुए हैं, लेकिन यह सच है कि आंदोलनकर्मी अराजकता पर उतर आए। किसानों की भीड़ उत्पात मचाने लगी। तमाम उपद्रवियों ने लाल किले का रुख किया और वहां घुसकर अपने संगठन का झंडा फहरा दिया। हर देशवासी के लिए यह दृश्य अपमानजनक और पीड़ादायक है। संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी कर इस पर लीपापोती करने की कोशिश की है। राकेश टिकैत ने कहा कि रैली में कुछ अराजकतत्व घुस आए हैं। बाद में उन्होंने कहा कि उपद्रव करने वाले आंदोलनकर्मी नहीं, बल्कि राजनैतिक पार्टी के लोग हैं। इसके बाद बयान दिया कि पुलिस ने रैली के लोगों को इजाजत देने के बाद भी रोकने की कोशिश की और लोग आक्रोशित हो उठे।
महाराष्ट्र में बैठे वरिष्ठ राजनीतिज्ञ शरद पवार ने कहा कि गणतंत्र दिवस पर जो हुआ, वह सरकार की जिम्मेदारी है। सरकार ने अपना फर्ज नहीं निभाया। लोग आक्रोश में आ गए। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने कहा कि दिल्ली में जो हुआ, उससे हैरान हूं। आंदोलनकारियों को तुरन्त दिल्ली खाली कर राजधानी की सीमा पर लौट आना चाहिए। लेकिन सच यह है कि इस बीच तथाकथित किसान नेताओं का कुछ पता नहीं था। वे जैसे भूमिगत हो चुके थे। एक दिन पहले तक आंदोलन की बागडोर संभालने का दावा करने वाले नेताओं की घिग्घी बंध गई। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या बोले, हकीकत यह है कि इन किसान नेताओं के हाथ से आंदोलन की बागडोर निकल चुकी थी। इनकी कोई सुनने वाला नहीं था। इनकी जगह उपद्रवियों ने ले ली।
हालात काबू करने के लिए गृह मंत्रालय ने आनन-फानन में एक बैठक बुलाई। गृह मंत्री अमित शाह के घर हुई इस बैठक में दिल्ली पुलिस कमिश्नर सहित तमाम आला अधिकारी मौजूद रहे। दिल्ली में अर्धसैनिक बलों की 15 कंपनियां तैनात करने का निर्णय लिया गया। शाम होते-होते पुलिस कमिश्नर ने जवानों को सख्ती बरतने का आदेश दिया। उसके बाद लाल किले को खाली कराया गया और किसान आंदोलनकर्मी भी अपने-अपने खेमे में लौटने लगे। दिल्ली पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा है कि किसान आंदोलनकारियों ने शर्तें तोड़ी हैं। पुलिस की कुल 37 शर्तें थीं, एक भी पालन नहीं किया गया। तय समय से पहले ट्रैक्टर रैली शुरू कर दी। तोडफ़ोड़ की, हिंसा की। इसके बावजूद पुलिस ने संयम से काम लिया। सच है, पुलिस ने वाकई संयम नहीं खोया, वरना 86 पुलिसकर्मी आज घायल न होते। उनकी जगह उपद्रवी होते। फिलहाल, पुलिस ने 15 थानों से अधिक में इन घटनाओं के मामले दर्ज किए हैं। हिंसा करने वालों की पहचान करनी भी शुरू कर दी है, लेकिन इस सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन किसान नेताओं का क्या होगा जो बड़े-बड़े दावे कर रहे थे? क्या उनकी कोई जवाबदेही नहीं है? एक राष्ट्रीय दिवस पर देश की राजधानी में इनके कार्यकर्ता क्या करेंगे, इन्हें पता तक नहीं था और ये आंदोलन के अगुवा बनते हैं! हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। गणतंत्र दिवस पर हुई इस शर्मनाक घटना ने देश में एक विश्वनीय और प्रमाणिक किसान आंदोलन की उम्मीदों पर भी पान फेर दिया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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