सफल होना है तो सकारात्मक सोच रखने का लें संकल्प: राजीव रंजन

दिल्ली ब्यूरो/ राष्ट्रीय जनमोर्चा
पटना। ग्लोबल कायस्थ कांफ्रेंस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन ने बुधवार को अपने उद्घोषित सात मूलाधार के वचनों में से छठवें वचन ‘सकारात्मकता’ का उद्देश्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि हम सभी के मन में अधिकतर दो तरह के विचार आते है- सकारात्मक एवं नकारात्मक। सकारात्मक एक ऐसी शक्ति और सोच है, जिससे जीवन में आने वाली तमाम बाधाओं और कठिनाईयों का हम आसानी से सामना कर सकते हैं। सकारात्मक सोच से ही हम सभी अपने संगठन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं।
राजीव रंजन ने कहा, हमारी सोच जैसी होगी, हम वैसा ही व्यवहार करेंगे। अगर अच्छा सोचेंगे तो अच्छा ही होगा, इसलिए हमेशा हमें एक दूसरे के प्रति स्नेह और सहानुभूति का भाव रखना चाहिए। हम सब कृतज्ञभाव से संकल्प लें कि सकारात्मकता से एक-दूसरे के मन में विश्वसनीयता, दृढ़ता एवं कार्य के प्रति उत्सुकता का भाव लाने का प्रयास करेंगे। आज हम सभी प्रतिज्ञा लेंगे कि तन, मन,धन और सकारात्मक सोच से संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाने के लिए कृतसंकल्पित होंगे।
उन्होंने कहा कि सकारात्मकता एक ऐसा शब्द है, जिससे जीवन में उत्साह और प्रसन्नता आती है। निर्बलता, दीन-हीन और लाचार की भावना जीवन से निकल जाती है। हमें संगठन को मजबूत बनाने के लिए आपस में प्रगाढ़ संबंध स्थापित करने के लिए सकारात्मक सोच को मूलमंत्र बनाना होगा।
स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं –
“उठो, मजबूत बनो और जिम्मेदारी को स्वीकार करो। दूसरों को दोष मत दो, संगठन में योगदान देना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।”
“संगठन में जब आप कोई काम कर रहे हैं, तो उसे पूजा की तरह करें। सर्वोच्च उपासना के रूप में करें और अपने पूरे जीवन को उस कार्य में समर्पित कर दें।”
राजीव रंजन ने कहा कि ग्लोबल कायस्थ कांफ्रेंस परिवार का मानना है कि हम भाई-बहन की तरह मिल-जुलकर संगठन के कार्य को पूजा मानकर काम करें। एक विचार लें, उसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लें, उस विचार के बारे में सोचें, सपना देखें और उस विचार को पूरा करने के लिए किसी भी हालात से न डरें, तभी सब मिलकर अद्भुत काम कर पाएंगे।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है परिहरू वचन कठोर।।
अर्थात सकारात्मक सोच और मीठे वचन से सभी ओर सुख फैलता हैं, सकारात्मक सोच किसी को भी वश में करने का यह एक मन्त्र होता है, इसलिए मानव को चाहिए कि कठोर वचन छोड़कर मीठा बोलने का प्रयास करें।

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