मुकुल शर्मा
भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने तांडव मचा रखा हैl न जाने कितने लोग अकाल ही काल के गाल में समा गए। संकट की इस घड़ी में कुछ नहीं सूझ रहा है। कई-कई परिवारों का सफाया हो गया। चारों तरफ मरघट जैसा सन्नाटा पसरा हुआ है। किसी ने लाडला खोया तो किसी के सिर से मातृ-पितृ का साया उठ गया। कोई ऐसी दिशा नहीं है, जहां कोरोना महामारी की भयावहता से चीख-पुकार न मची हो। हाहाकार मचा है पूरे देश में। न तो सरकार नजर आ रही है और न ही लोकतंत्र का मजबूत आधार कहा जाने वाला विपक्ष। जनमानस फरियाद करे तो किससे करे?
हम आपको अपने दिल का दर्द बता रहे हैं। कोरोना संक्रमितों का बढ़ता आंकड़ा और उससे होने वाली मौत अब भयभीत करने लगी है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकार क्या कर रही है? क्या इस राष्ट्रीय आपदा से निपटने के लिए उसके पास कोई योजना नहीं है? दूसरी तरफ विपक्ष है लेकिन उसके पास भी कोरोना को लेकर कोई जवाब नहीं है। राज्यों की बात करें या केन्द्र की राजनीति की, बड़े-बड़े नेता जो कल तक जनता के हितैषी होने का दावा करते थे आज गायब हैं। करुण क्रंदन में भी आज उन्हें किसी का दुख-दर्द नहीं सुनाई दे रहा है। आखिर कहां गई उसकी विपक्ष की अपनी भूमिका? एक-दो को छोड़ दें तो सब के सब जैसे भूमिगत हो गए हैं। किसी के पास कोरोना महामारी से निपटने की कोई नीति या योजना नहीं है। एक-दो नेता जो इस मुद्दे को उठा भी रहे हैं तो वो महज अपनी राजनीति चकमाने के लिए। उनके पास कोरोना से बचाव या इसके संक्रमण को काबू करने की कोई ठोस योजना नहीं है। जनता उनसे पूछती है कि आखिर ऐसा क्यों?
हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा या अन्य चार राज्यों में हुए चुनाव ने इन राजनीतिज्ञों के चेहरे पर और कालिख पोत दी है। कोरोनाकाल के इस संकट में भी कई राजनैतिक दलों ने वोट लेने के लिए पहले तो जनता का इस्तेमाल किया, फिर उनके हाल पर उन्हें छोड़ दिया। ईश्वर की कृपा से आज कोई गरीब-मजदूर कोरोना के प्रकोप से बच भी जाय तो भूख उसके सामने मौत बनकर खड़ी है। दिहाड़ी मजदूरों और रोजाना कमाकर दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वालों का हाल बेहाल है। वे अगर घर से काम पर न जाएं तो परिवार के भूख से मरने का डर है और काम से घर लौटकर आते हैं तो कोरोना से परिवार की जिंदगी का डर सताने लगता है। काम पर गए परिवार का एक भी व्यक्ति संक्रमित हुआ तो पूरा घर-परिवार तबाह हो सकता है। आम आदमी जाए तो कहां जाए? आगे कुआं है तो पीछे खाई। हमें उम्मीद है कि राज्य और केन्द्र सरकार तमाम व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने की कोशिश करेगी। विपक्ष को भी यह समझना होगा कि यह समय जनसेवा का है, आरोप प्रत्यारोप की भूमिका छोड़कर हर किसी को जनसेवा करना चाहिए। आज सभी दलों को चाहिए कि वे इस विषम परिस्थिति में गरीब और असहाय लोगों की मदद कर उनका हौसला बढ़ाएं तभी इस कोरोना महामारी की जंग हम जीत पाएंगे।
(लेखक एंटी करप्शन फेडरेशन ऑफ इण्डिया के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)


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