मांझी जो नाव डुबोये, उसे कौन बचाये

मनोरंजन सहाय सक्सेना
राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा अनुमान लगाया जा रहा था कि आसन्न पांच विधानसभा चुनावों में भाजपा किसी न किसी तरह अपने प्रमुख बिरोधी दल कांग्रेस को घेरने के लिये हमारे देश की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर वर्तमान सरकार की सराहनीय आक्रामक कार्यवाही को मुद्दा बनाकर पेश कर सकती है। मगर कांग्रेस के मनीष तिवारी ने इस अवसर का इन्तजार ही नहीं किया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कभी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के काफी निकट रहे मनीष तिवारी ने तो अपनी किताब प्रकाशित कर और उसमें होटल ताज में हुये- निर्दोष नागरिकों पर गोलीबारी की आतंकवादी कार्यवाही के विरुद्ध डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही तत्कालीन राष्ट्रीय सरकार द्वारा इस आतंकवादी कार्यवाही पर पाकिस्तान के बिरुद्ध कोई आक्रामक कार्यवाही नहीं करने का मुद्दा उठाकर भाजपा को कांग्रेस पर हमलावर होने और कांग्रेस के रक्षात्मक मुद्रा में आने का अवसर प्रदान कर दिया है। जबकि बिडम्वना यह है कि कांग्रेस अपने बचाव में- Offence is best defence की आक्रामक नीति न अपनाकर हमलावर की गल्तियां गिनाने लगती है। इसी कारण कांग्रेस अपने भूतपूर्व राजनेता और नायकों पर होते राजनैतिक हमलों द्वारा उनके चरित्र हनन तक की रक्षा कर ही नहीं पाती। ऐसे अवसरों पर कांग्रेस जन का होमवर्क बेहद कमजोर लगता है।
उधर कांग्रेस के राष्ट्रीय शीर्ष नेतृत्व के साथ कांग्रेस के राष्ट्रीय युवा नेतृत्व को भी पता नहीं क्या सूझी कि एक मसखरे, ठोको ताली का नारा लगाने बाले गैर जिम्मेदार व्यक्ति को न केवल कांग्रेस में आमंत्रित कर लिया बल्कि उसके हाथ में पंजाब जैसे सीमावर्ती महत्त्वपूर्ण राज्य का कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व भी सौंप दिया, और राज्य में कांग्रेस शासन का नेतृत्व कर रहे, एक कद्दावर कांग्रेसी नेता को कांग्रेस छोड़ने को उस वक्त मजबूर कर दिया, जब पांच-छ: महीने बाद ही वहां विधानसभा के चुनाव होने हैं। और अब भी कांग्रेस का राष्ट्रीय और युवा नेतृत्व उस मसखरे गैरजिम्मेदार क्षेत्रीय अध्यक्ष के गैरजिम्मेदाराना निर्णयों पर ही काम करने को मजबूर दिखाई दे रहा है।
कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व और हर वरिष्ठ नेता कांग्रेस का जहाज़ डुबोने के लिये तत्पर दिखाई दे रहा है। ऐसे में गत सदी के सत्तर के दशक में आई एक फिल्म के एक गाने की यह पंक्तियां बड़ी प्रासंगिक लगती हैं- मांझी जो नाव डुबोये उसे कौन बचाये।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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