अनिल भाटी
लड़की की शादी की उम्र 18 नहीं, 21 वर्ष होनी चाहिए। यह कानून भविष्य में हम सभी के जीवन को प्रभावित करने वाला है, जिसके लिए हमें खुद को तैयार रखना होगा। क्योंकि यह महिलाओं के जीवन को प्रभावित करने वाला अति महत्वपूर्ण फैसला है। हम सभी ने बहन-बेटियों के भविष्य को लेकर कोई न कोई सपना संजोए रखते हैं, जिन्हें यह फैसला अवश्य प्रभावित करेगा और हमें उन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए अब तैयार रहना होगा। साथ ही समाज को भी तैयार करना होगा।
सोशल मीडिया पर लोगों की जो प्रतिक्रिया आ रही है, उसके अनुसार भारत जैसे देश में (ग्रामीण क्षेत्र) लड़कियों की शादी की उम्र 21 वर्ष किये जाने के कई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई देते हैं। एक सज्जन का कहना है, “प्राचीन काल अनुसार इंसान की औसत आयु 100 वर्ष निर्धारित थी और लड़की को 18 वर्ष की उम्र में शादी के बाद उसे मां बनने के लिए परिपक्व माना जाता था मगर अब जब इंसान की औसत आयु सिर्फ 65 से 70 वर्ष रह गयी है तो लड़की के मां बनने हेतु परिपक्व उम्र भी कम होनी चाहिए न कि बढ़ानी चाहिए।”
एक अन्य सज्जन की प्रतिक्रिया है, “इससे दुष्कर्म और लिव-इन रिलेशनशिप आदि को बढ़ावा मिलेगा।” एक और साथी कहते हैं, “अधिक उम्र में लड़कियों की शादी मां बनने (गर्भधारण) की दृष्टि से उचित नहीं है।” एक सज्जन का तो यहां तक कहना है कि इससे माता-पिता और परिवार की चिंता को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि लड़कियां तो शादी होने तक एक बोझ की तरह होती है आदि आदि।
खैर, जिसने जो भी प्रतिक्रिया दी वे उनके अपने विचार हैं और हम इन सभी का सम्मान करते हैं। निश्चित ही आप सब भी कुछ इसी तरह की आशंकाओं से घिरे होंगे… और ये चिंताएं जायज भी हैं। क्योंकि हर किसी व्यक्ति के अपने संसाधन हैं, अपनी सोच है और अपना सामाजिक माहौल है। लेकिन बात महिला सशक्तिकरण की आती है तो लड़कियों की शादी की उम्र 21 वर्ष करना एक सराहनीय फैसला है।
मगर इसकी विवेचना जरूरी है, क्योंकि इस कानून के बाद जो चुनौतियां आने वाली हैं उनसे निपटने के लिए हमे और आपको ही तैयार रहना होगा। हमने मान लिया कि भारत एक ग्रामीण बहुलतावादी देश है, जिसमें अधिकतर लोगों की सोच ‘बेटियां मां-बाप के लिए बोझ’ होने वाली होती है। लेकिन क्या हम अपनी बहन-बेटियों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर सकते हैं?
एक रिपोर्ट के अनुसार लड़कियों की शारिरिक एवं हड्डियों की ग्रोथ 20 से 24 वर्ष तक बढ़ने की क्रिया होती है। मतलब यदि लड़कियों की शादी 21 वर्ष की उम्र में होती है तो 22 या 23 वर्ष की उम्र में वह यदि मां बनना चाहती है तो वह उसके लिए परिपक्व रूप से तैयार होती है। लेकिन यदि 18 वर्ष की उम्र में शादी होती है तो 25 वर्ष होते-होते वह अमूमन दो-तीन बच्चों की मां बन चुकी होती है, जिसका असर भविष्य में उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालता है और यह देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए देश के आंकड़े बातते हैं कि कम उम्र में शादी पर प्रति एक लाख प्रजनन पर करीब 150 महिलाएं बच्चा प्रज्जन के दौरान कमजोरी के कारण दम तोड़ देती हैं और बच्चों का मृत आंकड़ा इससे भी कहीं अधिक चिंताजनक है।
अब बात आती है सशक्तिकरण की तो जाहिर सी बात है कि जब शादी 21 वर्ष की उम्र में होगी तो बेटियां कम से कम इस उम्र तक ग्रेजुएशन तो कर ही लेंगी। लेकिन 18 वर्ष की उम्र में शादी होने का मतलब अधिकांश मामलों में बेटियां इंटर के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। क्योंकि ससुराल जाने के बाद कुछ अपवाद को छोड़ दें तो शायद ही वह आगे की पढ़ाई जारी रख पाती है। इसलिए यह खुशी की बात है कि जागरुकता के बढ़ते माहौल के बीच अब भी ज्यादातर बेटियों की शादी 21 वर्ष के बाद ही हो रही है, पर जब यह कानून बन जाएगा तो निश्चित ही महिलाओं के सशक्तिकरण में अभूतपूर्व बदलाव आएगा।
लेकिन व्यक्तिगत जीवन में इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण मां-बाप एवं अन्य परिजनों को सचेत रहना होगा। उन्हें बेटियों के साथ दोस्ताना सम्बंध रखना होगा, ताकि हमारी बेटियां भटककर कहीं किसी अप्रिय घटना का शिकार न हो जाएं। आप तो जानते हैं, उम्र जीवन का एक बेहद नाजुक दौर होता है और इसी उम्र के दौरान कुछ अप्रिय घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। ऐसे में हमें और सतर्क व सचेत रहने की जरूरत है। क्योंकि बेटियों भविष्य उज्जवल रहे, इसके लिए हर चुनौती हमें सहर्ष मंजूर है।
(लेखक समाजसेवी एवं ‘महिला उन्नति संस्था’ के राष्ट्रीय महासचिव हैं।)


उपर्लिखित शब्दों का प्रभाव निश्चित रूप से ही समाज पर पड़ेगा। आपके द्वारा कही गयी सभी बातें, किसी व्यक्ति विशेष नही समाज को दर्शाता है, और यही समाज अपने मे कई तरह की सोच और उसके फलस्वरूप परिणाम दिखाता है। खैर मैं तो यही कहूँगा कि ये फ़ैसला सर्वथा उचित है।