सुदामा पाल/राष्ट्रीय जनमोर्चा
देश में प्रतिदिन निरंतर बढ़ रहे कोरोना केसों के बीच पांच राज्यों में विषम परिस्थितियों में हो रहे विधानसभा चुनाव का माहौल पिछले चुनावों से एकदम अलग है। चुनाव आयोग द्वारा फिलहाल 15 जनवरी तक लगाये गए प्रतिबंधों के तहत राजनीतिक दलों का किसी भी तरह के रोड शो, जनसभा, नुक्कड़ सभा आदि न कर पाने की पीड़ा उन नेताओं को उठानी पड़ रही है, जो चुनाव में उम्मीदवार बनकर अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाना चाहते हैं। ऐसे नेता टिकट की दावेदारी के लिए अपने आकाओं व अन्य दलों के प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के सामने अपने समर्थकों की भीड़, धनबल व बाहुबल नहीं दिखा पा रहे हैं। इस समय सबसे ज्यादा परेशान दलबदलू व मौकापरस्त नेता हैं, जिनकी जनता में अच्छी साख व विश्वासनीयता नहीं है, क्योंकि कोरोना व चुनाव आयोग के प्रतिबंधों के कारण वे धनबल पर भीड़ जुटाकर अपने पक्ष में माहौल नहीं बना पा रहे। उप्र में पहले चरण के होने वाले जिलों में 14 जनवरी से नामांकन शुरु हो जाएंगे, ऐसे में नामांकन जुलूस के बहाने भी वे अपनी ताकत नहीं दिखा पाएंगे।
हालांकि चुनाव आयोग द्वारा जनसभा, रोड शो पर प्रतिबंध 15 जनवरी तक ही है लेकिन कोरोना की जो स्थिति दिनोदिन गंभीर होती जा रही है, उससे ये पाबंदी आगे भी जारी रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा व मणिपुर में हो रहे इस बार के विधानसभा चुनाव का माहौल निश्चय ही काफ़ी बदला हुआ नजर आ रहा है। इस बार विशेषकर उप्र विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को प्रभाव में लेने के लिए किसी भी पार्टी के लिए बड़े नेताओं के दम पर प्रचार-प्रसार से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रत्याशियों की जनता के बीच निजी छवि व साख होगी, क्योंकि इस समय कोरोना की तीसरी लहर के चलते इसकी उम्मीद कम ही है कि चुनाव आयोग पूर्व चुनावों की भांति चुनाव प्रचार की अनुमति देगा। इसलिए सीमित दायरे में रहकर प्रतिबंधों के बीच ऐसे उम्मीदवारों को जनता से सीधा संपर्क करना मुश्किल होगी, जो नये अथवा पहली बार चुनाव मैदान में उतरकर अपनी किस्मत आजमाएंगे। ऐसे उम्मीदवार भले ही पार्टी नेतृत्व की कृपा दृष्टि के चलते टिकट तो हासिल कर लेंगे, लेकिन बिना मिले, उनके बीच बिना संवाद किये मतदाताओं से वोट रुपी कैसे प्राप्त कर सकेंगे, ये विचारणीय है। फिलहाल, अभी तो सबकी निगाहें 15 जनवरी के बाद चुनाव प्रचार प्रसार संबंधी चुनाव आयोग के आगामी निर्णय पर टिकी हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


Leave a Reply