सम्मानों से बहुत ऊंचा है साहित्य के पुरोधा से. रा. यात्री का कद

सुशील कुमार शर्मा/राष्ट्रीय जनमोर्चा
गाजियाबाद। महानगर के नवरत्नों में शुमार 90 वर्षीय देश के दिग्गज कथाकार से.रा. यात्री कविनगर स्थित अपने आवास पर कई साल से बिस्तर पर ही पड़े रहते हैं। इसी स्थिति में वह जो भी मिलने उनसे आता है, उनका अभिवादन और स्नेह स्वीकार करते हैं। इस बीच वह पत्नी और दो बेटियों को खोने का दुःख भी सह चुके हैं लेकिन मिलने आने वाले साहित्यकारों के बीच साहित्यिक चर्चा जरूर करते हैं।
दूरदर्शन ने “दूत” पर बनाई फिल्म:
से. रा. यात्री की 300 से अधिक कहानियां, 40 से अधिक कहानी संग्रह, 32 से अधिक उपन्यास के अलावा अनेक संस्मरण, व्यंग्य और साक्षात्कार अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। विगत 50 वर्षों में देश के प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, ज्ञानोदय, कादम्बिनी, सारिका, साहित्य अमृत, साहित्य भारती, बहुवचन, नई कहानियां, कहानी, पहल, श्रीवर्षा, शुक्रवार, नई दुनिया, वागर्थ, रविवार आदि में से. रा. यात्री की कहानियां, उपन्यास, साक्षात्कार, संस्मरण, समीक्षा, लेख, व्यंग्य आदि प्रकाशित होते रहे हैं। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर रचनापाठ होने के साथ-साथ कई चैनलों पर साक्षात्कार भी प्रसारित होते रहे हैं। वर्ष 1987 से वर्ष 2003 तक हिन्दी की महत्वपूर्ण पत्रिका “वर्तमान साहित्य” का उन्होंने सम्पादन किया है। दुनिया के नामचीन विचारकों, चिंतकों, लेखकों, कवियों व राष्ट्राध्यक्षों आदि के मध्य हुए‌ पत्राचार पर “चिट्ठियों की दुनिया” पुस्तक का भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशन (वर्ष 2013), देश के प्रगतिशील लेखकों की चर्चित कहानियों के संग्रह “विस्थापित” का सम्पादन और वर्ष 2009 में उनकी कहानी “दूत” पर दूरदर्शन ने फिल्म का निर्माण भी किया है।
सम्मानों की लंबी श्रृंखला:
देश के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में से. रा. यात्री की कहानियों को शामिल किया गया है। दो दर्जन से अधिक शोधार्थियों द्वारा उनके लेखन पर शोध किया गया है और जारी है। उन्हें मिले सम्मानों और पुरस्कारों की भी एक लम्बी श्रृंखला है। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उनकी “धरातल” कहानी संग्रह वर्ष 1979 में पुरस्कृत, “सिलसिला” कहानी संग्रह वर्ष 1980 में पुरस्कृत, “अकर्मक क्रिया” कहानी संग्रह वर्ष 1983 में पुरस्कृत, “अभयदान” कहानी संग्रह वर्ष 1997 में पुरस्कृत, वर्ष 2004 में उन्हें “साहित्य भूषण सम्मान” से सम्मानित किया गया। वर्ष 2008 में उन्हें “महात्मा गांधी साहित्य सम्मान” से सम्मानित किया गया। वर्ष 1986 में उन्हें समग्र लेखन के लिए “सावित्री देवी शेर सिंह चौधरी सम्मान”, वर्ष 1993 में उन्हें राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, डूंगरपुर (राजस्थान) द्वारा “साहित्य श्री” सम्मान, वर्ष 1998 में “राजस्थान पत्रिका” द्वारा जयपुर में आयोजित समारोह में उनकी कहानी “विरोधी स्वर” के लिए उन्हें सम्मानित किया गया।
विदेशों में भी बढ़ाया देश का मान:
वर्ष 1999 में उनकी पुस्तक (संस्मरण) “लौटना एक वाकिफ उम्र का” के लिए उन्हें प्रतिष्ठित “सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सम्मान” से नवाजा गया। वर्ष 2007 में उन्हें समन्वय संस्था द्वारा “सारस्वत सम्मान” से सम्मानित किया गया। वर्ष 2017 में उन्हें सेतु साहित्यिक पत्रिका के पिट्सबर्ग (अमेरिका) के शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया।
लोकप्रिय कहानियां और संग्रह:
उनकी कहानी संग्रह हैं- दूसरे चेहरे, अलग-अलग, अस्वीकार, काल विदुषक, धरातल, केवल पिता, सिलसिला, अकर्मक क्रिया, विस्थापित, टापू पर अकेले, खंडित संवाद, नया संबंध, भूख तथा अन्य कहानियां, अभय दान, चर्चित कहानियां, पुल टूटते हुए, खारिज और बेदखल, विरोधी स्वर, इक्कीस पुरस्कृत कहानियां, परजीवी, राग पर्व, घाटे का भविष्य, मंजिल की तलाश, असमर्थताओं के विरुद्ध, फिर से इंतज़ार, खंडित संवाद, बहरूपिया, मेरी चुनिंदा कहानियां, विदा की तकलीफ़।
उपन्यास जिन्होंने मचाई धूम:
दराजों में बंद दस्तावेज, लौटते हुए, चांदनी के आर-पार, बीच की दरार, अंजान राहों का सफर, कई अंधेरों के पार, बनते बिगड़ते रिश्ते, चादर के बाहर, प्यासी नदी, भटकता मेघ, आकाशचारी, आत्मदाह, बावजूद, एक छत के अजनबी, प्रथम परिचय, दिशाहारा, अंतहीन, प्रथम परिचय, जली रस्सी, टूटते दायरे, युद्ध अविराम, अपरिचित शेष, बेदखल अतीत, आखिरी पड़ाव, सुबह की तलाश, घर न घाट, एक जिंदगी और, अनदेखे पुल, बैरंग खत, टापू पर अकेले, दूसरी बार, दरारों के बीच, मायामृग, कलंदर, जिप्सी स्कालर, सुरंग के बाहर, नदी पीछे नहीं मुड़ती, बिखरे तिनके, समीप और समीप व गुमनामी के अंधेरे में।
लौटाना एक वाकिफ उम्र का:
उनके व्यंग्य हैं- किस्सा एक खरगोश का, कोई नाम न दो व दुनिया मेरे आगे। उनका संस्मरण है- लौटाना एक वाकिफ उम्र का। उनकी संपादित पुस्तकें हैं- रंग और रेखाएं, उपेन्द्र नाथ “अश्क ” सृजन और व्यक्तित्व व चिट्ठियों की दुनिया।

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