कृष्ण कुमार द्विवेदी
गाजियाबाद। कल टहलकर पार्क में बैठा ही था कि हमसे पहले पांच-सात लोगों की टीम बैठी इस बात पर गहन चर्चा कर रही थी कि श्राद्ध कर्म वैज्ञानिक नहीं है। ये सब ब्राह्मणों का खाने और दक्षिणा लेने का ढकोसला मात्र है। शास्त्र ब्राह्मणों ने अपने हित में व समाज विरोधी लिखे हैं। साथ में अन्य बहुत बुराइयां भी…
हम आपको बताना चाहते हैं कि विज्ञान बहुत ही आवश्यक है पर अध्यात्म से अभी बहुत ही छोटा है। जिंदगी की हर चीज वैज्ञानिकता की कसौटी पर नहीं कसी जा सकती है। विज्ञान बाहर ढूंढता है और अध्यात्म अंदर। बिना श्रद्धा और विश्वास के न जीवन चल सकता है न अध्यात्म, उपरोक्त शास्त्र विरोधी विचार रखने वाले कोई दो-चार नहीं, इनकी संख्या लाखों में है। भाई उन सबसे मेरा प्रश्न है कि वे अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही सहमत हैं तो अपने पूज्य पिताजी का नाम लिखने से पहले अपना और उनका डीएनए टेस्ट करवा लें, मिलता है तो ठीक अन्यथा खोज करते रहें और अपने डॉक्यूमेंट में तब तक पिताजी के नाम के आगे ब्रेकट () में ‘अनुमानित’ लिखे रहे।
दूसरा प्रश्न यह है कि सनातन का कोई कर्म काण्ड करवाने के लिए कोई ब्राह्मण लट्ठ लेकर उनके घर गया नहीं है, लाखों लोग बिना विवाह के लिव इन में रह रहे हैं। एक भी पंडित उनसे विवाह करवाकर दक्षिणा मांगने गया हो तो बताइएगा।
ब्राह्मण इसलिए दरिद्र रहा क्योंकि उसने धन की जगह ज्ञान पर जोर दिया, भिक्षा भी मांगी तो सुख भोगने के लिए नहीं बल्कि पेट भरने के लिए। बदले में राज्य को शिक्षा, चिकित्सा ,गुप्तचर, कर्म काण्ड, आयुध अनुसंधान आदि मुफ्त में दिया है। ब्राह्मण को गाली देना आसान है, कभी ब्राह्मण बन कर देखिएगा। भयंकर सर्दी में जब तुम गरम पानी से हफ्ते में एक दिन नहाते हो, ब्राह्मण तब भी प्रातः चार बजे उठकर ठंडे पानी से स्नान कर अपनी पूजा-अर्चना कर विश्व कल्याण की कामना करता है। ब्राह्मण ने जब शास्त्र लिखा तब सारी सीमाएं पार कर दीं और जब शस्त्र उठाया तो द्रोणाचार्य और परशुराम बन गया। याद रखिएगा, ब्राह्मण ने आज तक आरक्षण और खैरात के लिए हड़ताल नहीं किया है और जिन शास्त्रों की तुम बुराई कर रहे हो, उन सबको ब्राह्मणों ने ही नहीं लिखा है।
बुराई करने वालों में ज्यादातर वो लोग हैं जिनके घर में चुहिया भी भूखी मरकर जान दे देती है तथा दान के नाम पर कभी किसी गौरैया को भी एक दाना नसीब नहीं होता है।
तुम लोग दुबे, मिश्रा, पांडेय, तिवारी, शर्मा, जोशी, शुक्ला, पाठक, उपाध्याय को ही ब्राह्मण मानकर विरोध कर रहे हो, भाई ये सब प्रतीक मात्र हैं। ब्राह्मण वो है जो उर्ध्वगामी सोच रखकर ब्रह्म को जानना चाहता है तथा विश्व कल्याण की भावना रखता है। ब्राह्मण किसी जाति तक सीमित नहीं है। जो इस मार्ग पर चला वो पूज्य हुआ, जैसे वेद व्यास, बाल्मीकि, कबीर, रैदास, गुरु नानक जी, अंबेडकर इत्यादि।
ब्रह्मणत्त्व एक पवित्र विचारधारा है जो शाश्वत रूप से मां भागीरथी की तरह निरंतर कल-कल करती बहती रही है और बहती रहेगी। मुगल, तुर्क, अंग्रेज, डच, पुर्तगाली, मंगोल, वामपंथी सभी ने इस विचारधारा को मिटाने की भरपूर कोशिश की है पर क्या मिटा पाए? कल्याणकारी विचार धाराएं कभी मरती नहीं हैं, उनको अगर धरती न भी मिले तो पीपल के बीज की तरह दीवारों और छत के कोने में भी निकलकर जिंदा रह लेती हैं और समाज को अपनी ऑक्सीजन देती रहती हैं।
जिस मां-बाप ने तुमको पैदा किया, अपनी हैसियत के अनुसार पालन-पोषण किया। तुम्हारे भविष्य के लिए उसने अपना वर्तमान, भविष्य और जवानी स्वाहा कर दी हो, उसके मरने के बाद यदि तुम उसके श्रद्धा व सम्मान में उसके नाम का एक दीपक नहीं जला सकते हो, किसी गरीब को एक जून का एक खुराक खाना नहीं खिला सकते हो, उनकी तस्वीर के जाले साफ कर एक माला नहीं पहना सकते हो, तो ये तुम्हारी समस्या है। किसी ब्राह्मण की नहीं, फिर तो तुम्हारी सोच के उदगम पर प्रश्न चिन्ह तो खड़ा होगा ही।
अंत में भाई ये राष्ट्र, इसका इतिहास, संस्कृति, संस्कार, विरासत सबकुछ जितना हमारा है, उतना ही आपका भी है। अगर आपके मां-बाप जिंदा हैं, सामर्थ्य अनुसार उनकी सेवा कीजिए। मरणोपरांत भी उनके प्रति जैसे आपको पसंद है, उन पर श्रद्धा सम्मान रखिए। बहुत अच्छा लगेगा, सोचिएगा, अगर वो नहीं होते तो हम भी नहीं होते। किसी को गाली देने और अपशब्द कहने से समस्या पैदा होगी, समाधान नहीं।
जय श्री सीताराम!
(लेखक समाजसेवी एवं कथावाचक हैं।)


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