शरद चन्द्र
आज हमारे समाज के लड़के-लड़कियां पढ़ाई और कैरियर बनाने (नौकरी करने) में अपनी उस संस्कृति को भूल गए हैं, जब माता-पिता एक निश्चित अवधि तक उनकी शादियां कर दिया करते थे। उसका परिणाम समय से संतानोत्पत्ति और उनका पालन, शिक्षा, रोजगार सब हो जाता था। संबंध विच्छेद की समस्याएं कम होती थीं।
40-45 की लड़कियों की शादी 50 की उम्र के लड़कों के साथ होने से संतान होने का अवसर खत्म माना जाय। लिव इन गर्भ निरोधक गोलियां भी शरीर पर बुरा प्रभाव डालती हैं, जिससे कम उम्र में गर्भाशय के कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। कुछ दहेज एवं सरकारी नौकरी वाले लड़कों के फेर में जहां लड़की भी योग्य हो तो भी एक मोटी रकम दहेज की डिमांड शादी में बाधक बनती है।
अपनी संस्कृति की ओर न लौटकर फिल्मी कल्चर की नकल में मण्डप से बाहर एक स्टेज पर हल्दी मेहंदी को फोटो शूट करना, ड्रेस कोड लाना महज हमारी फिजूलखर्ची को बढ़ाते हैं। युवक-युवतियों को अभिभावक अथवा माता-पिता पर इस अतिरिक्त बोझ को कम करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लड़का पढ़ाई किया हो लेकिन किसी तरह से रोजगार न पा सका हो, ऐसे लड़के की भी शादी होनी चाहिए। लड़का-लड़की समय से शादी करें। वर पक्ष को तामझाम कम कर के एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।
रोजगार जरूरी है, लेकिन जब लड़का-लड़की शिक्षित हों तो शादी समय से करें। प्रेम पूर्वक मिल-जुलकर अपने परिवार की परवरिश में जुटें। स्वजातीय विवाह हो और माता-पिता की सहमति से विवाह हो, यही सुखदायक है।
नशेड़ी के माता-पिता अगर उसके ऐब जान गए हों तो उसकी शादी कर किसी और की जिंदगी न बर्बाद करें, ऐसा ध्यान रखना जरूरी है। हमें चाहिए कि विवेक का इस्तेमाल करते हुए लोभ धन के लालच की कुप्रथा को दूर करें। अपने दायरे में शादी-विवाह समय पर करें ताकि लड़के-लड़कियों का जीवन खाली धनोपार्जन में न लगे, बल्कि गृहस्थ आश्रम के महत्व को भी वे समझें। एकाकी वादी न बनकर परिवारवादी बनें।
सारे तामझाम को दरकिनार कर एक उचित समय पर विवाह होना अतिआवश्यक है अन्यथा हम दिनोंदिन अल्पसंख्यक होते जाएंगे। यह हमारा व्यक्तिगत अनुभव व निजी विचार हैं। मैंने समय से दहेज मुक्त बच्चों की शादी कर उन्हें कार्यक्षेत्र में उतरने के साथ-साथ संतान सुख का भी समय दिया और आज नातिन पोती-पोते संग जीवन संध्या का आनंद ले रहा हूं।
आप भी आगे बढ़ें। शादी के मार्ग की जटिलता को दूर कर सहजता लाने का प्रयास करें। कायस्थ समाज का कल्याण हो, उनमें सद्भावना हो! जटिलता का समाधान हो! संतान खुश तो हम भी ख़ुश।
(लेखक ऑल इण्डिया कायस्थ काउंसिल के राष्ट्रीय सचिव हैं।)


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