सुधांशु श्रीवास्तव
इंटरनेट की दुनिया ने जहां सूचना क्रांति ला दी है, वहीं इसका दुरुपयोग भी बढ़ता जा रहा है। अनेक देशों में साइबर क्राइम के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ब्यूरोक्रेट हों या कोई बड़ी कम्पनी, नेता हों या अभिनेता आथवा कोई राजनीतिक पार्टी, सभी इसकी जद में हैं। ऑनलाइन ठगी करना आम बात हो चुकी है। अभी पिछलों दिनों देश की कई राजनीतिक हस्तियों ने सरकार पर पेगासस के जरिये जासूसी का आरोप लगाया है। पुलिस साइबर अपराध से निपटने में भले ही सुसज्जित हो गई है लेकिन देश में साइबर अपराध दोष-सिद्धि अनुपात आज भी खराब बना हुआ है। इससे जुड़े अपराधी नित नए तरीके अपनाकर क्राइम करते रहते हैं।
ऑनलाइन से अब डर लगता है :
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार अब साइबर क्राइम देश के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन चुका है। इंटरनेट और टेक्नोलाजी से लैस नई डिजिटल दुनिया में अनचाहे काल, अनजाना मैसेज, अवांछित ईमेल, अपिरिचत फ्रैंडशिप रिक्वेस्ट लोगों को डराने लगे हैं। ऐसे ही अनर्गल मीम्स, अननेचुरल पिक्चर, वीडियो, लाटरी, बिजनेस गेम, डिस्काउंट लिंक, आफर वाले तमाम एप और गैर जरूरी बैंकिंग इनफार्मेशन के जाल में लोग आसानी से फंसाए जा रहे हैं, जबकि आनलाइन कामकाज दिनोंदिन मुश्किल होता जा है। छोटी-बड़ी खरीदारी से लेकर रकम के ट्रांजेक्शन, बात-बात पर सूचना-संपर्क और जानकारी जुटाने के लिए आनलाइन या लाइव होना रोजमर्रा की आवश्यकताओं में शामिल हो चुका है।
यूपी में सर्वाधिक मामले :
सरकार के मुताबिक साल 2023 में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी के कुल 11.28 लाख मामले सामने आए। फ्रॉड के मामलों में सबसे अधिक केस उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। लेकिन यह तो वह आंकड़ा है, जो दर्ज हुए हैं। जबकि साइबर क्राइम के मामले केवल एक तिहाई ही पुलिस में दर्ज होते हैं। बहुत सारे लोग ऐसी घटना की रिपोर्ट नहीं करते या फिर उनकी सुनवाई नहीं होती है।
तकनीकी इंतजाम नहीं के बराबर:
साइबर क्राइम के तहत साइबरबुलिंग, फिशिंग, यौन शोषण, जबरन वसूली और हैकिंग जैसे धोखाधड़ी के मामले सामने आते हैं लेकिन इससे निजात दिलाने के लिए तकनीकी इंतजाम नहीं के बराबर हैं। पुलिस के मुताबिक गूगल प्लेटफार्म पर कई एप डिलीट किए जाने के बाद पुन: नाम बदलकर एक्टिव हो जाते हैं। इसके मद्देनजर पुलिस ने बिजनेस गेम, डिस्काउंट लिंक जैसे एप से सावधान रहने की हिदायत दी है, लेकिन गूगल प्लेटफार्म के जरिए आने वाले ऐसे एप को रोका जाना उनके वश की बात नहीं है। कारण नए एप बनाने के रेडीमेड साफ्टवेयर टैंपलेट बिजनेस पोर्टल पर फ्री ट्रायल सर्विस के साथ उपलब्ध हैं। मामूली पैसा खर्च कर उनकी सर्विस लेकर कोई भी मिनटों में नया एप बना सकता है।
अंकुश लगाना एक बड़ी चुनौती:
अक्सर संदिग्ध एप लोगों को वाट्सएप, टेलीग्राम, ग्रुपिंग एप या आफलाइन के मैसेजिंग बाक्स में लिंक मैसेज से मिलते हैं। उसे डाउनलोड करते समय इंस्टालेशन फाइल गूगल के सर्वर पर ले जाती है। वहीं से यूजर का मोबाइल कनेक्ट हो जाता है। एप डाउनलोड करने से पहले ही डाटा लेने का एक मैसेज आता है। एप उस विकल्प को स्वीकार करने के बाद ही अगले चरण की ओर आगे बढ़ता है। इसके लिए दी गई पालिसी को लोग अमूमन नहीं पढ़ते हैं, जो लंबा और उलझा होता है। परंतु ये एप ओटीपी को पढ़ लेते हैं। यानी एसएमएस की जानकारी भी एप को होती है। उसके बाद मोबाइल की ट्रैकिंग आसान हो जाती है। सर्च पर गूगल की-वर्ड के स्टोर के होते ही मोबाइल की लोकेशन, ट्रांजेक्शन नजर में आ जाता है। साइबर क्राइम पर अंकुश लगाने की यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि मोबाइल डाटा चुराकर साइबर जालसाज न केवल निजी फोटो या वीडियो को वायरल कर सकता है, बल्कि हैकिंग करके वसूली भी कर सकता है।
सख्त कानून बनाने की जरूरत :
दिन-प्रतिदिन बढ़ते साइबर क्राइम के आतंक से निबटने के लिए इसे न केवल गंभीर मुद्दे के तौर लेना होगा, बल्कि तकनीक की समझ के लिए लोगों को जागरूक करने और उसकी कमी को दूर करना होगा। इस संबंध में एक सख्त कानून बनाने की भी जरूरत है। भारत में बने कानून के मुताबिक किसी के सिस्टम से निजी या गोपनीय डाटा या सूचनाओं की चोरी को अपराध माना गया है। इसके लिए आइटी (संशोधन) कानून 2008 की धारा 43 (बी), धारा 66 (ई), धारा 67 (सी), आइपीसी की धारा 379, 405, 420 और कापीराइट कानून है। इसके दोष साबित होने पर तीन साल की सजा या दो लाख रुपये तक जुर्माना है।
सजा की दर भी नाकाफी:
आज डिजिटल क्षेत्र में हमारी निर्भरता अमेरिकी कंपनियों पर बनी हुई है। यहां चौंकाने वाली बात यह भी है कि अमेरिका की हजारों बड़ी आइटी कंपनियों की निगाह भारत पर टिकी हुई है। यहीं से उनका बिजनेस चलता है। उनके तकनीकी कर्मचारियों में भारतीयों की संख्या भी काफी अधिक है। ऐसे में भारत में गूगल जैसे प्लेटफार्म का सपना देखना बेमानी लगता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि इस कारण भी हमारी पुलिस साइबर क्राइम के छोटे तालाब की मछली तक को नहीं पकड़ पा रही है। उनके लिए साइबर मामलों को सुलझाने में अधिकार क्षेत्र बड़ी बाधा बनती है। जिससे साइबर ठग के सजा की दर काफी कम है।
साइबर अपराधियों को पकड़ना आसान नहीं:
दिल्ली पुलिस के अनुसार दिल्ली में रिपोर्ट किए गए अधिकांश मामलों में आरोपी बंगाल, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के होते हैं। स्थानीय स्तर पर इन्हें नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां जाना और उन्हें पकड़ना भी आसान नहीं है। ऐसे में पुलिस का सुझाव है कि अगर साइबर अपराध के बारे में लोगों को जागरूक किया जाए तो इस तरह के अपरध में कमी लाई जा सकती है। भारत सरकार ने एक ऐसी वेबसाइट शुरू की है, जहां आनलाइन धोखाधड़ी की शिकायत दर्ज की जा सकती है। यहां दर्ज की गई शिकायतों को संबंधित राज्य की पुलिस, राजकीय या केंद्रीय कानूनी एजेंसियों की ओर से दी गई सूचनाओं के आधार पर निपटाया जाता है। ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई के लिए शिकायत दर्ज करते समय सटीक जानकारी देना भी आवश्यक है।
(लेखक एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा के आईटी मैनेजर हैं।)


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