सहन्सरा नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
सहारनपुर। सेंटर फ़ॉर वॉटर पीस से जुड़े पर्यावरणविद डॉ उमर सैफ़ के नेतृत्व में वर्ष 2017 से शिवालिक रेंज की पहाड़ियों से निकलने वाली सहन्सरा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया जा रहा है। इसी कड़ी में रविवार, 28 अगस्त को सहारनपुर जिले की बेहट तहसील के गाँव कोठरी बहलोलपुर स्थित सहन्सरा नदी-घाटी की सेंटर फ़ॉर वॉटर पीस के सदस्यों-कार्यकर्ताओं के एक दल ने यात्रा की। इस अवसर पर डॉ सैफ़ ने बताया कि पिछले 5 वर्षों के दौरान उन्होंने वन विभाग एवं जनसाधारण के सहयोग से नदी के दोनों तटों पर सघन पौधरोपण कराया है। नदी घाटी में कुछ चैक डैम भी बनाए गए हैं। बारिश के पानी के ठहराव से भूमिगत जल की मात्रा में वृद्धि हो रही है।
उन्होंने ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ से बताया कि वृक्षों की जड़ें मिट्टी के कटाव को रोक रही हैं। परिणामस्वरूप नदी के अंदर जलीय जीव व पेड़-पौधे पनप रहे हैं। नदी की सतह एवं तटों पर भी अन्य जीव पानी पीने एवं भोज्य सामग्री की तलाश में आ रहे हैं। इस तरह नदी का जीवन लौट रहा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को अपना कर अनेक नदियों को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
गंदगी प्रवाहित करने का अर्थ है उसकी हत्या कर देना:सेंटर फ़ॉर वॉटर पीस के निदेशक संजय कश्यप ने बताया कि सहारनपुर क्षेत्र में ऐसी कई छोटी-बड़ी नदियाँ हैं जिनके पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कोई भी नदी अपने उद्भव क्षेत्र में कैसी साफ़ और निर्मल होती है लेकिन जैसे-जैसे नदी गाँवों-क़स्बों-शहरों से बहती हुई आगे बढ़ती है वह प्रदूषित होती चली जाती है।नदी में किसी भी तरह की गंदगी प्रवाहित करने का अर्थ है उसकी हत्या कर देना।
कविता के माध्यम से बताया जीव-जंतुओं का अस्तित्व: इंडिया वॉटर पोर्टल के केसर सिंह ने कहा कि राज व समाज दोनों को पारिस्थितिकी के मूल्य को समझना पड़ेगा। किसी वृक्ष का मूल्यांकन सिर्फ़ उससे प्राप्त होने वाली लकड़ी के आधार पर किया जाना एक बड़ी मूर्खता है। हमें किसी वृक्ष का मूल्यांकन इस आधार पर करना चाहिए कि वह हर रोज़ वातावरण में कितनी ऑक्सीजन छोड़ रहा है। केसर सिंह की बात से सहमति प्रकट करते हुए कवि प्रवीण कुमार ने कहा कि इसी दृष्टि से अन्य जीव-जंतुओं के अस्तित्व को भी देखा जाना चाहिए। उन्होंने अपनी एक कविता ‘मिट्टी का मोल’ पढ़कर अपनी बात को और विस्तार से बयान किया।
संरक्षण के लिए अदालतें पारित करती रही हैं आदेश: आईआईटी दिल्ली के स्कॉलर डॉ पिनाकी दास ने कहा कि हमारी संस्कृति में सदियों से नदियों को जीवित तंत्र के रूप में देखा जाता रहा है। हम उन्हें माता का दर्जा देकर पूजते रहे हैं। आज दुनिया की कई सरकारों ने अपने संविधान में नदियों को जीवित तंत्र के रूप में दर्ज कर लिया है। हमारे यहाँ भी माननीय सुप्रीम कोर्ट व कई हाई कोर्ट गंगा नदी व अन्य नदियों को जीवित तंत्र मान कर उनके संरक्षण के लिए आदेश पारित करते रहे हैं। सेंटर फ़ॉर वॉटर पीस के सचिव जितेंद्र सिंह एडवोकेट ने संस्था के मिशन से जुड़ने के लिए सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर अन्य सदस्य-कार्यकर्ता कौस्तुभ भारद्वाज एडवोकेट, कुमारी लवलीन, मोहम्मद इलियास आदि भी उपस्थित रहे।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*