राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान के तत्वावधान में एक परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।एडवोकेट प्रवीण कुमार के आरडीसी, राजनगर स्थित कार्यालय पर संपन्न हुए इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात व्यंग्यकार आलोक पुराणिक रहे। परिचर्चा शुरू करते हुए पुराणिक ने कहा कि हिंदी के भविष्य को लेकर हमें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।हिंदी विश्व में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।हिंदी का शब्दकोश सभी भाषाओं से ज़्यादा समृद्ध है।ज़रूरत इस बात की है कि हिंदी ज्ञान-विज्ञान की भाषा बने। अगर चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि या अर्थशास्त्र की अच्छी किताबें हिंदी में लिखी जाएँ, अगर हिंदी में अच्छा साहित्य रचा जाए तो निश्चित रूप से हिंदी समृद्ध होगी। अच्छे कंटेंट से ही भाषा समृद्धि प्राप्त करती है।
परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात चित्रकार डॉ लाल रत्नाकर ने कहा कि शासन में बैठे लोग नहीं चाहते कि आम आदमी सत्ता के गलियारों तक पहुँचे।शासक वर्ग की कमियों को जान सके। इसलिए जान-बूझकर अंग्रेज़ी को राज-काज की भाषा बनाए हुए हैं। इस अवसर पर अमर भारती के संस्थापक एवं वरिष्ठ गीतकार डॉ धनंजय सिंह ने बताया कि तकनीकी शब्दों के ग़लत अनुवाद से हिंदी को बहुत नुक़सान हुआ है।
प्रख्यात नव-गीतकार जगदीश पंकज ने हिंदी दिवस मनाए जाने की सार्थकता पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा जैसे रस्मी आयोजनों से हिंदी का भला नहीं हो पाएगा।डॉ वी के शेखर का सुझाव था कि हमें अपनी स्थानीय भाषाओं व बोलियों को हिंदी का ही विस्तार मानना चाहिए।परिचर्चा में डॉ रमेश कुमार भदौरिया, सुरेंद्र शर्मा, अरविंद पथिक, प्रमोद शर्मा, ममता सिंह राठौर, हिमानी कश्यप, पराग कौशिक, छायाकार कुलदीप, सुरेश मेहरा अंकित वशिष्ठ एडवोकेट, अभिषेक कौशिक आदि ने भी उत्साह के साथ अपने विचार साझा किए। परिचर्चा के बाद उपस्थित रचनाकारों ने काव्यपाठ भी किया।कार्यक्रम का संचालन संस्थान के महासचिव प्रवीण कुमार के द्वारा किया गया।


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