सुदामा पाल
उत्तर प्रदेश के कई छोटे व नये दलों के नेता समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने को लालायित हैं। अखिलेश भी ऐसे नेताओं को गले लगाने से गुरेज़ नहीं कर रहे हैं। इनमें अवसरवादी नेता के रुप मे चर्चित ओमप्रकाश राजभर से वे पिछले सप्ताह ही हाथ मिला चुके हैं। हालांकि राजभर भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते थे और कई दिन तक वे भाजपा का गुणगान करते हुए वरिष्ठ भाजपाईयों की जी हुजूरी में लगे रहे थे, लेकिन भाजपा नेतृत्व ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया। इससे सपा से हाथ मिलाने के सिवाय उनके पास और कोई चारा भी नहीं था।
आल इंडिया मजलिस -ए- इतेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असद्दुदीन ओवैसी व आज़ाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आज़ाद पहले से ही राजभर के भागीदार संयुक्त मोर्चा में शामिल हैं। मोर्चा में शामिल सुहेलदेव भारतीय सुभाषवादी पार्टी ही प्रदेश में कुछ अस्तित्व रखती है, जबकि ओवैसी व चंद्रशेखर पहली बार नये खिलाड़ी के तौर पर विस चुनाव के राजनीतिक पिच पर उतर रहे हैं। इसलिए इनके राजनीतिक वजूद व जनाधार के पूर्वानुमान भी औचित्यहीन माने जा रहे हैं। इन दलों के अलावा दो पुराने दल राष्ट्रीय लोक दल व प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) की भी सपा के गठबंधन की पूरी संभावनाएं बनी हुई हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सपा मुखिया भाजपा के सामने मजबूत विपक्ष व जनता के समक्ष भाजपा का विकल्प के तौर पर स्वयं को प्रस्तुत करने के प्रयास में लगे हैं। इसके लिए नये दलों से गठबंधन करना उनकी राजनीतिक आवश्यकता हो सकती है।
अखिलेश यादव गठबंधन के नाम पर बड़ा ‘राजनीतिक कुनबा’ तो जोड़ सकते हैं, लेकिन उनके समक्ष इस नये कुनबे को संभालकर रखना भी कम बड़ी चुनौती नहीं होगी। इनमें सीटों का बंटवारा आसान नहीं होगा। एक बड़ा अल्पसंख्यक वर्ग सपा से जुड़ा है। ओवैसी सिर्फ़ मुस्लिम मतदाताओं के दम पर उत्तर प्रदेश में आपनी पार्टी की उपस्थिति दर्ज़ कराने की कोशिश में हैं। उप्र में उनकी पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। चुनाव में यदि उन्हें आशातीत सफलता नहीं भी मिली, तो वे चुपके से हैदराबाद चलते बनेंगे, लेकिन सपा मुखिया को तो उत्तर प्रदेश में ही रहना है। ओवैसी की पार्टी की जीत हार का सीधा असर सपा पर पड़ेगा। उधर कुनबे में शामिल होने वाले नेताओं व उनके चहेतों को खुश करने के चक्कर में यदि अखिलेश यादव की पार्टी के सच्चे व समर्पित कार्यकर्ता ही नाराज़ हो गये तो सपा का बना बनाया खेल बिगड़ भी सकता है। इसलिए ‘कुनबा’ जोड़ने से पहले संभावित स्थितियों पर भी गहनता से विचार करने की आवश्यकता है। वैसे भी सपा का पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नुकसान का ही सौदा साबित हुआ था, जबकि लोकसभा चुनाव में सपा मुखिया ने बसपा से गठबंधन किया था। इस गठबंधन का भी सारा फायदा बसपा को मिला।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में बसपा ने जान-बूझकर अपने ही उम्मीदवार उतारे थे और आधा दर्जन से अधिक सीटों पर विजय पताका लहराकर संसद में अपना वजूद कायम कर लिया था, जबकि सपा अपने सांसदों की संख्या में वृद्धि नहीं कर सकी थी। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि सपा मुखिया ने नये दलों गठबंधन से पूर्व संभावित राजनीतिक परिदृश्य पर विचार नहीं किया तो पूर्व की भांति इस बार भी सपा से गठबंधन दूसरे दलों के लिए तो फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इनका साथ सपा को सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा देगा, ऐसा नहीं माना जा सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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