राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। मीडिया 360 लिट्रेरी फाउंडेशन के ‘कथा संवाद’ में सुनी गई कहानियों पर चर्चा करते हुए सुप्रसिद्ध रंगकर्मी व सिने कलाकार रघुवीर यादव ने कहा कि एक दौर था जब साहित्यिक कृतियों पर कालजयी फिल्मों का निर्माण होता था। आज के दौर में साहित्य समाज और सिनेमा दोनों से दूर होता जा रहा है। इसकी खास वजह साहित्य और सिनेमा से मौलिकता का लोप हो जाना है। उन्होंने कहा कि ‘कथा संवाद’ जैसे कार्यक्रम मौलिकता को संरक्षण और संजीवनी हैं।
यादव ने कहा कि हिंदी सिनेमा पर पाश्चात्य संस्कार और संस्कृति हावी होती जा रही है। इसकी एक वजह हमारी मौजूदा पीढ़ी का किसी हद तक आत्मकेंद्रित होना भी है। आज की पीढ़ी दो दूनी चार की तरह जिंदगी बसर करने में यकीन रखती है। खानपान से लेकर पठन-पाठन में तत्काल (इंस्टेंट) संस्कृति तेजी से पनप रही है। जिसके चलते हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य और लोक कलाएं हाशिय पर चली गई हैं। लेकिन ‘कथा संवाद’ जैसे कार्यक्रम हमें अपनी जड़ों की ओर ले जाने का काम करते हैं।
नेहरू नगर स्थित लाइन प्रेस्टीज स्कूल में आयोजित कथा संवाद में बतौर विशिष्ट अतिथि बोलते हुए यादव ने कहा कि हमारा साहित्य विश्व स्तरीय धरोहर है। लेकिन हमें अंग्रेजी सिनेमा में सफलता के तत्व दिखाई देते हैं। सिनेमा से लेकर साहित्य के क्षेत्र में हमें अपनी मौलिकता को समृद्ध करना होगा। ‘कथा संवाद’ जैसे कार्यक्रम ही मौलिकता को संरक्षण प्रदान कर सकते हैं।
कार्यक्रम अध्यक्ष एवं सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने कहा कि ‘कथा संवाद’ में पढ़ी गई कहानियां रिश्तों को नई गर्माहट दे रही हैं। कोविड काल में मानवीय रिश्ते हाशिए पर चले गए हैं। जिन्हें बचाने के लिए उनका नए सिरे से बुना जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि ‘कथा संवाद’ जैसे कार्यक्रम ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत हैं। इस कार्यक्रम में जुटे लेखक और श्रोता इस बात का प्रमाण हैं कि गाजियाबाद साहित्य के नए तीर्थ के तौर पर स्थापित हो रहा है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गोविंद गुलशन ने कहा कि गाजियाबाद जैसे कंक्रीट के जंगल में ‘कथा संवाद’ जैसे कार्यक्रम का चार साल का निरंतर सफर इसके साहित्यिक तौर पर उर्वरक होने कि प्रमाण है। इस अवसर पर डॉ. भावना कुंवर के तांका संग्रह ‘यादों का गांव’ का भी लोकार्पण हुआ। कथाकार सिनीवाली, मनु लक्ष्मी मिश्रा, डॉ बीना शर्मा, शिवराज सिंह, प्रगीत कुंअर, गार्गी कौशिक, रविंद्रकान्त त्यागी और सुभाष अखिल की कहानियों पर, सुभाष चंदर, अतुल सिन्हा, अक्षयवरनाथ श्रीवास्तव, आलोक यात्री, रिंकल शर्मा, मीना झा आदि ने अपने विचार प्रकट किए।
कार्यक्रम में वागीश शर्मा, बी. एल. बतरा, अशोक वासुदेव, तिलक राज अरोरा, पराग कौशिक, राकेश शर्मा, सौरभ सिंह, राजरानी शर्मा, अविनाश, विनीत गौड़, डॉ. महकार सिंह, फरमान अली, सुबोध कुमार, कैलाश चंद्र, जोगेंद्र सिंह, हरेंद्र कुमार, ओंकार सिंह, राजेश कुमार, दिनेश चंद्र श्रीवास्तव, तारा गुप्ता, तौषिक कर्दम, धीरेंद्र मिश्रा, सुरेश अखिल, डॉ. निधि कौशिक, अभिषेक कौशिक, डॉ. आरती बंसल, राष्ट्र वर्धन अरोड़ा सहित बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।


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