राष्ट्रीय जनमोर्चा ब्यूरो
राजस्थान की कामां विधानसभा सीट प्रदेश के लिए जितनी ही महत्वपूर्ण है, उतनी ही विकास के मामले में पीछे छूट गई है। पिछली बार यहां से बीजेपी जीत हासिल करने में चूक गई थी और कांग्रेस जीतने के बावजूद क्षेत्र का विकास नहीं कर सकी। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार यहां मुकाबला कड़ा हो सकता है। वैसे चुनाव का बिगुल बजते ही हर पार्टी का उम्मीदवार अपनी-अपनी दावेदारी का दम ठोकते हुए प्रचार-प्रसार शुरू कर चुके हैं। लेकिन अंदरूनी कलह के चलते कांग्रेस की सत्ता में वापसी आसान नहीं है।
राजस्थान का चुनावी इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि यहां जनता ने हर पांच साल में बदलाव किया है। कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस सत्ता में रही है। पिछले चुनाव में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा चुनाव हार गई थी, लेकिन इस बार कोई कसर न रह जाए इसलिए पूरा दम लगा रही है। कामां सीट से हर वह उम्मीदवार जो बीजेपी और कांग्रेस पार्टी का टिकट पाना चाहता है, अपनी पूरी जान लगा रहा है। कई उम्मीदवार जयपुर और दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं। मंत्रियों और बड़े नेताओं से मुलाकात कर अखबारों में अपनी फोटो छपवाकर जनता के बीच पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
कुछ उम्मीदवार आकाओं को क्षेत्र में बुलाकर स्वागत कर रहे हैं। कोई अधिक से अधिक भीड़ जुटाने में लगा है तो कोई बाइक रैली निकालकर यह बता रहा है कि क्षेत्र में उसका सबसे बड़ा जनाधार है। इसके बावजूद नेता मंत्री महज आश्वासन दे रहे हैं कि अगले हफ्ते से टिकट बंटना शुरू हो जाएगा। ऐसे में लगातार संशय बना हुआ है कि कामां सीटी से किस पार्टी का कौन उम्मीदवार होगा?
कुछ उम्मीदवार ऐसे भी हैं जिनको अपनी औकात पहले ही समझ आ चुकी है, वे दूसरी पार्टी से संपर्क साध रहे हैं। अगर वह अपने मकसद में सफल हो जाते हैं तो जनता के सवाल उठाने पर जवाब देते हैं कि पिछली पार्टी की सोच अच्छी नहीं थी, इसलिए हमें मजबूरन पार्टी बदलनी पड़ी। कहने का मतलब यह जैसे ही पार्टी छोड़ी, वह बेकार हो गई। फिलहाल, कांग्रेस हो या बीजेपी, जाति और धर्म का आकलन करते हुए अपने-अपने उम्मीदवार तय करने में लगी है। यह अलग बात है कि दोनों पार्टियों में दो-दो चार-चार दावेदार खम ठोक रहे हैं। साथ ही वे वे और उनके समर्थक बेसबरी से इंतजार कर रहे हैं कि कब उनके नामों की घोषणा हो और वे चुनाव प्रचार और तेज कर सकें।
‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ के इस संवाददाता ने हाल ही में डीग जिले की कामां विधानसभा सीट क्षेत्र का दौरा किया। उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि कांग्रेस के दो नेताओं में घमासान मचा है। एक पहले से विधायक हैं लेकिन जनता परेशान है, फिर भी उन्हें पार्टी का टिकट देना शायद कांग्रेस की मजबूरी है। जबकि दूसरे उम्मीदवार जो कांग्रेस के टिकट पर अपना भाग्य आजमाना चाहते हैं, उनकी ऐसी कोई खूबी नहीं है जिस पर जनता भरोसा करे। कुल मिलाकर विकास करने की नीति दोनों में से किसी के पास नहीं है और न ही उनका कोई ऐसा एजेंड अभी तक सामने आया है। लेकिन भाजपा इस संशय में जरूर पड़ गई है कि कहीं कांग्रेस नए उम्मीदवार पर दांव न खेल जाए। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कांग्रेस नए खिलाड़ी पर दांव खेलती है तो क्या बीजेपी मुस्लिम चेहरे को मैदान में उतारेगी? अगर कांग्रेस पुराने विधायक पर दांव खेलती है तो क्या बीजेपी की तरफ से हिंदू चेहरा होगा? फिलहाल, मुस्लिम वोट कैसे हासिल किया जाए, इसे लेकर दोनों पार्टियों में मंथन जारी है। साथ ही बसपा प्रत्याशी भी दलित वोट बैंक में सेंध लगाने का तैयार है। देखना है इसके आधार पर कौन सी पार्टी किसे उम्मीदवार बनाती है?
कांग्रेस के भीतर बवाल :
राज्य की कामां विधानसभा सीट को लेकर कांग्रेस पार्टी के भीतर ही बवाल हो गया है। इस सीट से विधायक जाहिदा खान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कैबिनेट में मंत्री हैं। जाहिदा खान के विरोधी और समर्थक शुक्रवार को दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय में आपस में भिड़ गए। दोनों गुट कांग्रेस मुख्यालय में आमने-सामने प्रदर्शन कर रहे थे।
जाहिदा खान के टिकट का विरोध करने वाले लोगों ने उनपर परिवारवाद ,भ्रष्टाचार और कमीशन खोरी का आरोप लगाया है। जबकि मंत्री के समर्थक विरोध करने वालों को भाजपाई बता रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि ये लोग भाजपा के इशारे पर जाहिदा का विरोध करने के लिए आएं हैं। फिलहाल, टकराव को देखते हुए अर्धसैनिक बल को बीच में आना पड़ा है।
युवाओं के पास रोजगार नहीं :
समाज के लिए लगातार कार्य कर रहे युवा नेता भगवंता सिंह क्षेत्र के विकास को लेकर स्पष्ट कहते हैं कि यह क्षेत्र विकास में बहुत पीछे छूट गया है। कामां में औद्योगिक इकाइयां स्थापित तो हुईं लेकिन चालू नहीं हो पाईं, जिससे यहां के अधिकतर युवाओं को रोजगार का लाभ नहीं मिल सका है।
वह कहते हैं, “ बिजली, पानी, सड़क और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलने के कारण क्षेत्र में विकास के आयाम स्थापित नहीं हो सके। सरकार के तमाम दावों के बावजूद भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग पाया है। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं आम लोगों तक आज भी नहीं पहुंच सकी हैं।”


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