वक्फ संशोधन कानून मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने खुद को किया सुरक्षित

अखलाक अहमद / राष्ट्रीय जनमोर्चा
नयी दिल्ली। वक्फ कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दो दिन की सुनवाई हो चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने भारत सरकार को सात दिनों का वक्त दिया है, इस समय सीमा में उसे जरूरी जवाब दाखिल करने हैं। बड़ी बात यह है कि सुनवाई के दौरान केंद्र ने खुद स्पष्ट कर दिया था कि जब तक सुनवाई पूरी नहीं हो जाएगी, वक्फ कानून के दो अहम पहलुओं को लागू नहीं किया जाएगा। अब बड़ी बात यह है कि केंद्र ने पहले ही अनुमान लगा लिया था कि कोर्ट इस ओर इशारा कर सकता है, ऐसे में खुद ही उस दिशा में कदम उठा सरकार ने अपने आप को सुरक्षित कर लिया।
उल्लेखनीय है कि वक्फा कानून में संशोधन मामले की सीजेआई जस्टिस संजीव खन्नाक की अध्यीक्षता वाली तीन जजों की पीठ सुनवाई कर रही है। सराकर की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्ष रख रहे हैं। गुरुवार का सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि वह वक्फ संशोधन कानून के दो विवादास्पद प्रावधानों (वक्फह बाय यूजर और और वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिमों को शामिल करना) के अमल पर रोक लगा देगी। केंद्र ने शीर्ष अदालत में ऑन रिकॉर्ड यह बात कही है। वक्फस संशोधन कानून पर सुप्रीम कोर्ट में यह बात कहकर केंद्र ने इस पर संभावित विपरीत फैसले को आने से पहले ही रोक दिया।
असल में वक्फ कानून को लेकर जब 16 अप्रैल को सुनवाई हुई थी, तब सीजेआई ने ऐसा इशारा किया था कि वे कम से कम तीन पहुलओं पर जरूर कुछ समय के लिए स्टे लगा सकते हैं। लेकिन तब केंद्र की तरफ से पेश हुए तुषार मेहता ने अदालत से अतिरिक्त समय मांगा, यहां तक कहा कि कोर्ट को कम से कम दो और वकीलों के पक्ष को सुनना चाहिए। तुषार मेहता की इस बात को तब कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद जब अगले दिन सुनवाई हुई, तुषार मेहता ने सुनवाई को आगे टालने की बात कर दी।
उनकी तरफ से कहा गया कि केंद्र सरकार को जवाब दायर करने के लिए समय चाहिए। बड़ी बात यह रही कि तुषार मेहता ने केंद्र की तरफ से खुद ही साफ कर दिया कि सरकार अभी वक्फ बोर्ड में किसी गैर मुस्लिम को शामिल नहीं करेगी। इसके बाद ही कोर्ट ने भी सात दिनों का वक्त केंद्र को दे दिया। अब समझने वाली बात यह है कि सरकार ने जब खुद ही अपने स्टैंड में थोड़ा बदलाव किया, तो मैसेज यह नहीं गया कि कोर्ट से झटका लगा बल्कि यह गया कि सरकार ने खुद यह फैसला लिया।
सरकार की यह वो नीति है जो पहले भी दिख चुकी है, बात चाहे अनुच्छेद 370 की हो, देशद्रोह की धाराओं को लेकर सुनवाई रही हो। ऐसा देखा गया है कि सरकार पहले ही भाप लेती है कि कोर्ट किस दिशा में फैसला दे सकती है, फिर चतुराई से उसी हिसाब से अदालत में पक्ष रखा जाता है। यहां 11 मई, 2022 का जिक्र होना जरूरी है, जब सुप्रीम कोर्ट में सेडिशन पर सुनवाई हुई थी, कोर्ट इसे अंसवैधानिक मान रहा था, सरकार को भी भनक थी कि इसे हटाया जा सकता है। अगर ऐसा होता तो विपक्ष आसानी से इसे सरकार की हार बता देता।

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