महंगी शिक्षा की मार, चुप मोदी सरकार

जितेन्द्र बच्चन
केंद्र सरकार लगातार जनहित में फैसले ले रही है। उसके अधिकतर निर्णय स्वागत योग्य हैं पर देश में महंगी होती शिक्षा ने गरीबों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। सरकार महंगाई पर काबू नहीं कर पा रही है। दाल-सब्जी, पढ़ाई-लिखाई और कॉपी-किताब, सभी चीजों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। गरीबों के सपने चकनाचूर हो रहे हैं। मध्यम वर्ग के लोग भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने का सपना आज की तारीख में नहीं सजो सकते। देशभर के लाखों माता-पिता महंगाई से जूझ रहे हैं।
बच्चों की अच्छी पढ़ाई का सपना अब जेब पर भारी पड़ रहा है। किताबों, यूनिफॉर्म और स्कूल ट्रांसपोर्ट के खर्चों के अलावा ट्यूशन फीस में भी हर साल बढ़ोतरी हो रही है। एक सर्वे में देशभर के 300 से ज्यादा जिलों से 85 हजार से अधिक माता-पिता की राय ली गई। चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। कई निजी स्कूल हर साल 10 से 15 प्रतशित तक फीस बढ़ा रहे हैं। पिछले तीन साल में बहुत से स्कूलों की फीस में 50 से 80 प्रतशित तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह बढ़ोतरी मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन चुकी है।
अप्रैल के प्रथम सप्ताह में घरेलू गैस के बढ़े हुए दाम ने एक बार फिर गृहणियों की आंखों में आंसू ला दिए हैं। उनका बजट पहले से ही गड़बड़ाया हुआ था। बड़ी मुश्किल से चूल्हा जल रहा था, दो जून की रोटी मिल रही थी। अभी तक चिंता थी कि स्कूल में छोटू का दाखिला कैसे होगा? ननकी बड़ी हो गई है। सातवीं में इस बार गई है लेकिन कॉपी-किताब का जुगाड़ अभी तक नहीं बन पाया है और नयी यूनीफार्म भी लेनी है।
सरकार का नारा है- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, लेकिन सरकार यह नहीं बताती कि महंगाई के जमाने में बेटी को कैसे पढ़ाएं? छोटकू के पापा में अब इतना दम नहीं है कि वह आठ घंटे से ज्यादा काम कर सकें। जनरल कटेगरी में आते हैं, इसलिए किसी तरह का आराक्षण या छूट भी नहीं मिलती। गरीबी रेखा के नीचे का राशन कार्ड बनवाने के लिए कितनी बार कहा, लेकिन कोई नहीं सुनता। दफ्तर जाते हैं तो कहते हैं पहले ऑन लाइन फार्म भरो, फिर उसका प्रिंट लेकर आओ। हमारी समझ में नहीं आता कि जब ऑफ लाइन (प्रिंट) ही होना है तो फिर यह ऑन लाइन का नाटक क्यों?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब नयी शिक्षा नीति की घोषणा की थी तो लगा था कि अब बच्चों को कोई परेशानी नहीं होगी। हम अपने सपने नहीं पूरे कर सके तो क्या हुआ, हमारे बच्चे जरूर शिक्षित हो जाएंगे। आराम से पढ़-लिख लेंगे। बड़े होकर किसी रोजी-रोजगार से लग जाएंगे। गरीबी खत्म हो जाएगी और हमारे भी अच्छे दिन आ जाएंगे। पर शायद यह गलतफहमी थी। नयी शिक्षा नीति के नाम पर सरकार का नारा तो बुलंद हो रहा है। स्कूलों की चमक-दमक भी बढ़ गई है। लेकिन शिक्षा पहले से कई गुना अधिक महंगी हो गई है। सरकारी हो या निजी स्कूल, अच्छे शिक्षकों की कमी है। कई सरकारी स्कूलों में तो शिक्षक ही नहीं पूरे हैं और जो हैं भी, उनकी अलग-अलग कामों के लिए सरकार ड्यूटी लगा देती है। कितनी चिंताजनक बात है कि जो नयी शिक्षा नीति बनाई गई है, उसके अनुसार व्यवस्था नहीं है। हां, कॉपी-किताब का बोझ जरूर बढ़ गया है। बच्चों की उम्र से दोगुना बस्ता होता है। हमारा छोटकू तो स्कूल से लौटते ही हांपने लगता है।
नयी शिक्षा नीति का जब मसौदा बन रहा था तो देश के कर्णधार ऐसी-ऐसी बातें कर रहे थे जैसे अमीर-गरीब के बच्चों में कोई भेदभाव नहीं होगा। सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चे भी सराकरी स्कूलों में ही पढ़ेंगे। लेकिन अब पता चला कि बाबू साहब का बेटा पहले भी कॉन्वेंट में पढ़ता था और आज भी वहीं जाता है। सरकारी जुमले और नारे महज गरीबों को बहलाने-फुसलाने के लिए होते हैं। कोई राजनीतिक दल या पार्टियां सिर्फ और सिर्फ वोटे हथियाने के लिए चुनावी मौसम में बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। अगर ऐसा न होता तो सरकार तो महंगाई पर खामोश है ही, विपक्ष ने भी क्यों चुप्पी साध ली है? महंगाई को लेकर अब कहीं हो-हल्ला नहीं मचता। कोई पार्टी या राजनीतिक दल सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन नहीं करती। कई बार तो विपक्ष एकदम नाकारा लगता है।
पहले दूध के दाम बढ़े। अब सरकार ने घरेलू गैस में प्रति सिलेंडर पचास रुपये की बढ़ोतरी कर दी है। जाहिर सी बात है जब ईंधन के दाम बढ़ेंगे तो अन्य जींसों पर अपने आप रेट हाई हो जाएगा। सरकार कहती है- बच्चों को पौष्टिक दो! उन्हें अच्छी शिक्षा दो, कहां से दे माई-बाप? महंगाई डायन खाए जात है। विधायक-सांसद भी विधानसभा और लोकसभा में महंगाई पर कुछ नहीं बोलते। आखिर जनता के नुमाइंदे इतने असंवेदनशील कैसे हो गए हैं?
(लेखक भारत में वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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