‘जहां का भव्य-दिव्य परिवेश, देश यह अनुपम भारत देश…’

राष्ट्रीय जनमोर्चा संवाददाता
गाजियाबाद। अमर भारती साहित्य-संस्कृति संस्थान की मासिक काव्य-गोष्ठी में डॉ रमेश कुमार भदौरिया द्वारा अपने खंडकाव्य ‘भारत-भारती’के कुछ अंश सुनाते हुए उपरोक्त पंक्तियाँ पढ़ीं। उन्होंने भारत देश के भूगोल-इतिहास के साथ-साथ धर्म-संस्कृति का अद्भुत वर्णन किया।
रविवार को राजनगर स्थित एक कार्यालय में संपन्न हुई गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार डॉ धनंजय सिंह ने की। उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल के चंद शेर कुछ इस तरह से कहे-
‘रात बारिश में झर गए पत्ते
सारे आँगन में भर गए पत्ते
ठूंठ जंगल में राह तकता रहा
जाने किस शहर ठहर गए पत्ते…।’
गोष्ठी में पूर्व पुलिस अधिकारी एवं कवि डॉ वीके शेखर ने सरस्वती वंदना एवं एक ग़ज़ल सुनाकर वाहवाही हासिल की।आपने कहा-
‘औरों को छोटा माने जो
इल्म उसे कमतर होता है
जिसका मालिक रूठ गया हो
खेत वही बंजर होता है…।’
वरिष्ठ छायाकार व कवि कुलदीप ने समाज में बुजुर्गों की बढ़ रही उपेक्षा पर मर्मस्पर्शी रचना सुनाकर सभी को द्रवीभूत कर दिया।
इसी क्रम में वरिष्ठ कवि विष्णु सक्सेना, सुरेंद्र शर्मा, डॉ संजय शर्मा, प्रवीण कुमार ने भी अपनी नई-नई रचनाएँ प्रस्तुत कीं।गोष्ठी में वरिष्ठ अधिवक्ता केपी सिंह व युवा कवि अंकित वशिष्ठ ने भी अपने ख़्याल साझा किए।गोष्ठी का संचालन करते हुए संस्थान के महासचिव प्रवीण कुमार ने कहा कि कोरोना महामारी के बढ़ते हुए प्रकोप के कारण अभी कम संख्या में रचनाकारों को बुलाया जा रहा है।आने वाले वक़्त में हालात बेहतर होने पर ज़्यादा लोगों को अवसर प्रदान किया जाएगा।

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