सर्वसम्मत फैसला, नया सवेरा

जितेन्द्र बच्चन
अभूतपूर्व निर्णय। सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला। अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर भव्य मंदिर बनने का रास्ता साफ। मुस्लिमों को भी दिया पांच एकड़ में मस्जिद बनाने के लिए जमीन देने का निर्देश। न्यायिक इतिहास में ऐतिहासिक घटना। राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकार की मुकम्मल कोशिश। धर्म और आस्था के नाम पर वोट की सियासत करने वालों के मुंह पर लगा ताला। कानून की परिधि में लाजवाब फैसला। पांच सौ साल से चली आ रही खत्म हुई माथापच्ची।
40 दिन से चली सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद 1045 पन्नों में लिखी गई इबारत। शनिवार, 9 नवम्बर, 2019 की सुबह न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने सुनाया फैसला। ऐसा फैसला, जिसका विवाद धर्म और आस्था की जमीन पर वर्षों से लंवित था। कोई समझौता, कोई राय-सलाह और हरेक मश्विरा नाकाम हो रहा था। हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई, फिर भी इस मामले को लेकर न जाने कितने लोगों का खून बहा। बहनों की मांग उजड़ गई। कई घर तबाह हो गए। मां की गोद सूनी हो गई। निजी और तमाम सरकारी सम्पत्ति खाक हो गई। अधिकारी बदले और सरकारें बदली, लेकिन कुछ नहीं बदला तो वह था अयोध्या की पीड़ा। असहनीय दर्द। आंखों से छलकते आसूं। दंगे की भेंट चढ़े जवान। गर्मी-जाड़ा हो या बरसात, एक तम्बू के नीचे बैठे रामलला की दीन-हीन दशा! यह कैसी विडंबना थी। जो श्रीराम दूसरों के दु:ख हर लेते हैं, जिनका नाम लेने से रोम-रोम आनंदित हो उठता है। तमाम कष्टों का निवारण हो जाता है, उन्हीं श्रीराम को इतनी पीड़ा! वह भी उनके चलते मिली जिसे उन्होंने ही जीवन दिया है। उफ, यह कैसा संसार है? यह कैसी संस्कृति है और किसने दिया यह कुसंस्कार? आंखें भर आती हैं। रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब तमाम दोजख के रास्ते बंद हो चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि का अंदर और बाहरी अहाता यानी पूरी जमीन मंदिर बनाने के लिए दी है। कोर्ट ने कहा है कि केन्द्र सरकार तीन महीने के भीतर न्यास या बोर्ड का गठन करे। राम जन्मस्थान का बाहर और अंदर का अहाता गठित ट्रस्ट या बोर्ड को सौंपा जाएगा। इसे मंदिर निर्माण से लेकर बाकी सभी अधिकार होंगे। साथ ही गैर कानूनी ढंग से मुसलमानों की मस्जिद तोड़े जाने पर उन्हें पुनर्वासित करने के लिए कोर्ट ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन वैकल्पिक जगह पर आवंटित करने का आदेश दिया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड को आवंटित जमीन पर मस्जिद बनाने की छूट होगी। कोर्ट ने यह भी व्यवस्था की है कि मुसलमानेां को पांच एकड़ जमीन या तो केंद्र सरकार अधिग्रहित जमीन में से देगी या फिर राज्य सरकार अयोध्या में किसी उचित और प्रमुख जगह पर उपलब्ध कराएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 1946 के फैजाबाद के कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली सिया वक्फ बोर्ड की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने विवदित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसेले को भी गैर कानूनी ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जमीन के बंटवारे से न तो पक्षकारों के हित उद्देश्य की पूर्ति होती है और न ही ये स्थाई शांति और सदभाव को पूरा करते हैं। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने निर्मोही अखाड़े का दावा भी खारिज कर दिया है, लेकिन यह व्यवस्था जरूर की है कि अगर केन्द्र सरकार चाहे तो मंदिर निर्माण के लिए बनने वाले ट्रस्ट में अखाड़े को उचित प्रतिनिधित्व दे सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के साथ ही दशकों पुराने विवाद का पटाक्षेप हो गया। अयोध्या में संतुलित और सभी की भावनाएं समाहित करने वाला निर्णय, सही मायने में यह फैसला मील का पत्थर है जो देश की दिशा तय करेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि सभी धर्मों और राजनीतिक दलों ने इस फैसले को सहर्ष स्वीकार किया है। यह भी अपने आप में एक ऐतिहासिक स्वीकारिता है। इससे किसी की हार-जीत नहीं हुई है। देश जीता है। नया सवेरा और नई शुरुआत। अभिनंदन!
(लेखक पत्रकार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं।)

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*