प्रीतिका बच्चन
गाजियाबाद। शहर की सुनीता भाटिया किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। बेजुबान और बेसहारा पशुओं की जैसे भगवान हैं वह। आवारा पशुओं की सेवा करना उनका अपना एक उद्देश्य है। मार्च 2018 से सुनीता बेसहारा पशुओं के खाने और उन्हें चिकित्सकीय सेवा मुहैया कराने में लगी हुई हैं। उनके इस काम से अब अन्य महिलाएं भी प्रेरित हो रही हैं और उनसे जुड़ने लगी हैं। सुनीता भाटिया की सेवा भावना का ही असर है कि उनके घर से बाहर निकलते ही बेसहारा पशु उनके आसपास एकत्रित हो जाते हैं।
नगर के गुलमोहर एंक्लेव निवासी सुनीता भाटिया पिछले करीब ढाई साल से बेसहारा और बेजुबान पशु-पक्षियों के खाना-पानी का इन्जाम करती आ रही हैं। सोसायटी की अधिकांश महिलाएं भी उनके इस काम में उनका साथ देती हैं। सुनीता रोजाना सोसायटी के प्रत्येक घर से बचा हुआ भोजन एकत्र करती हैं और फिर उसे सड़क पर घूमने वाले गाय, कुत्तों आदि को खिलाती हैं। इसके लिए वह प्रतिदिन सुबह-शाम दो-दो घण्टे सड़कों पर घूमती हैं। कोई बीमार पशु मिलता है तो उसके उपचार की व्यवस्था भी सुनीता खुद के ख़र्च से उठाती हैं। इसके अलावा सोसायटी के ही परिवारों से पुराने कपड़े एकत्र कर उन्हें गरीबों में बांटती हैं। उनके इस काम में सोसायटी के लोग बढ़-चढ़कर उनका सहयोग करते हैं।
सुनीता भाटिया ने राष्ट्रीय जनमोर्चा से बताया कि उनके द्वारा की जा रही पशु-पक्षियों के प्रति सेवा भाव को देखते हुए लोग उनकी थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद तो करते हैं लेकिन शासन-प्रशासन से इस संबंध में कोई सहयोग नहीं मिल रहा है। कई बार वह कुत्तों की नसबंदी करने के लिए भी नगर निगम के अधिकारियों से मिल चुकी हैं, उस पर भी आज तक कोई ध्यान नहीं दिया गया। सुनीता भाटिया चाहती हैं कि जैसे एक व्यक्ति को केयर किया जाता है, उसी तरह अगर इन बेजुबानों की भी सेवा की जाए तो इनका जीवन भी संवर सकता है। कई बार कोई वाहन इन पशुओं को टक्कर मारकर भाग जाता है। कुछ जाहिल लोग उन पर अत्याचार भी करते हैं। कई बार कुत्ते या अन्य बेजुबान बीमार पड़ जाते हैं लेकिन उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। आखिर इन आजाद पशु-पक्षियों को भी तो समाज में जीने का अधिकार है। फिर इनकी उपेक्षा क्यों?


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