केतन तिवारी
19वीं शताब्दी के मध्य में लार्ड मैकॉले द्वारा स्थापित आधुनिक शिक्षा पद्धति अपने गुणों के साथ कई अवगुण भी साथ लेकर आई। विशेषकर सहस्त्रों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित गुरुकुल शिक्षा पद्धति का विनाश प्रारम्भ हो गया। स्वाधीनता के करीब 75 वर्ष बीत जाने के पश्चात भी भारत की शिक्षा व्यस्था में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। यही कारण है कि इतनी बड़ी शिक्षित जनसंख्या होने के बावजूद नाममात्र विद्यार्थी ही वैज्ञानिक शोध, खोज अथवा रचनात्मकता की ओर अग्रसर हो पाए। परंतु अब इस व्यस्था में सुधार के शुभ संकेत दिखने लगे हैं। हरियाणा राज्य के सोनीपत में ऋषिहुड विश्वविद्यालय की स्थापना इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु की गई है। स्वामी विवेकानंद के दर्शन से प्रेरित होकर ऋषिहुड विश्वविद्यालय छात्रों को उनकी आंतरिक प्रतिभा के अनुरूप निखरने का उचित साधन और परिस्थिति प्रदान रहा है।
उच्चस्तरीय शिक्षा से सामाजिक बदलाव लाना ही विश्वविद्यालय का प्रमुख उद्देश्य है। छात्रों के बौद्धिक, शारीरिक, आध्यात्मिक एवं भावनात्मक विकास के लिए उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं, पाठ्यक्रम एवं शोध के उच्च अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। देश-विदेश के श्रेष्ठ अध्यापकों के उचित मार्गदर्शन में छात्र रोजगार ढूँढने की अपेक्षा रोजगार पैदा करने के गुण सीख कर सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत अंतःविषय एवं बहु विषयक शिक्षा का पूर्ण लाभ छात्रों को दिया जा रहा है।
अतिआधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित ऋषिहुड विश्वविद्यालय प्रबंधन, स्वास्थ्य, मनोविज्ञान और डिज़ाइन आदि क्षेत्रों में स्नातक और परास्नातक स्तर की शिक्षा प्रदान कर छात्रों को आत्मनिर्भर करने में विशेष भूमिका निभा रहा है। विश्वविद्यालय के कुलपति सुरेश प्रभु के विशाल अनुभव से प्रेरित विभिन्न उद्योगों से जुड़े संयोजक एवं अन्य उच्च पदों पर आसीन अधिकारीगण विशेष कक्षाओं द्वारा छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान देकर कार्यक्षेत्र की चुनौतियों के लिए तैयार करते हैं। दरअसल, भारतवर्ष आदिकाल से ही राजाओं, शासकों और योद्धाओं से अधिक ऋषियों को ही महान मानता आया है। इसलिए अपनी सम्पूर्ण शिक्षा पद्दति से छात्रों को किसी ऋषि के समान ही ज्ञान के पथ पर अग्रसर करना ही ऋषिहुड विश्वविद्यालय का निरंतर प्रयास है।
(लेखक ऋषिहुड विश्वविद्यालय के सहायक निदेशक है।)


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