व्यक्ति जब कविमना होता है तो जीवन दृष्टि का नज़रिया ही बदल जाता है, वो आदमी को चेहरे से नहीं उसके अन्दर झाँक कर उसमें वो टटोलने का प्रयास करता है जो ऊपर ओढ़ी हुई नकली मुस्कान के झीने परदे में छिपी वास्तविक पीड़ा है। उसे नन्हीं चिड़िया की आजादी पसन्द है लेकिन इस आजादी की आड़ में छिपे खतरों से भी उसे चिड़िया को सावधान करना है। उसे अपना गाँव, अपना शहर सब पसन्द है लेकिन वो व्यथित भी है। गाँव अब पहले से मीठेपन में पगे नहीं रहे, गाँव अब सौंधी मिट्टी की खूशबू के सैरगाह नहीं रहे, गाँव अब लहलहाती फसलों के सोना नहीं रहे। गाँव अब भाई, भौजाई, चचा, ताऊ, काका, काकी, मौसा, मौसी वाले रिश्तों के मनभीने अहसास नहीं रहे। इसी तरह शहर भी अब वो शहर नहीं रहे जहां आदमी का मूल्यांकन पैसों की कसौटी पर नहीं बल्कि उसकी विस्तारित सोच, सद व्यवहार, स्वभाव, उसकी शख्सियत और उसकी सामाजिक सद्धावना से आँका जाता था। हमारे आपके घर भी वो घर नहीं रहे जो आने जाने वाले मेहमानों के इन्तजार में पलक पाँवड़े बिछाये रहते थे। पूँजीवाद के इस आधुनिक बाजारीकरण में हम कहाँ से चलकर कहाँ आ गये हैं। इतना कुछ खोकर हमने पाया क्या? कविमना प्रवीण की मीठे घर की एक बानगी तो देखिये
ओ! मेरे घर! तुम सिर्फ मेरे नहीं हो
ना ही तुम्हारा आँचल बिछा है
मेरे राजदुलारों के लिए
तुम्हें अभी भी ख्याल है
मेरे बूढ़े और बीमार माता-पिता का
ओ! मेरे घर! तुम सिर्फ मेरे नहीं हो।
और फिर साथ ही वो प्यारा गाँव और उसका सोंधापन, उसका भोलापन और उसके मिटते अस्तित्व की पीड़ा-
बचपन में था मेरा एक गाँव
गाँव के चारों ओर
हरे भरे खेत खलिहान
गाँव से कुछ दूर था।
शहर का ज्ञान विज्ञान
बहुत लुभाते थे
वहाँ के बाजार
वो बचपन था मासूम और नादान
नहीं थी उसे खबर
आ रहा है दबे पाँव गाँव में तूफान
देखते ही देखते
शहर चला आया गाँव तक
उग आईं खेतों में
ऊँची-ऊँची अट्टालिकायें
सूख गये सब पोखर
उजड़ गये खेत-खलिहान।
हमारे शहर जो महज चलती फिरती लाशों की सैरगाह बनकर रह गये हैं, अब संवेदनहीन, मशीनों के जाये, प्यार सरोकर विहीन, तनावयुक्त चेहरे वाले, रूखे, लिजलिजे, अपने ही गुणा भाग में डूबे, संवादहीन। हम सच में “बुतों के शहर में” ही तो जी रहे हैं। किसी को किसी से कोई मतलब नहीं, कोई सरोकर नहीं न जीने में न मरने में। कवि की अपने गुज़रे वक्त के प्यारे शहर की आन्तरिक वेदना का मार्मिक एक चित्र भी है और अपने शहर की वर्तमान सहेजी प्राकृतिक संपदा का मनोहारी दृश्य भी है
ये जो शहर है
ये मेरा शहर है
मुझे स्नेह से पुकारते हैं
इसके वीरान खंडहर
जहाँ दफ़्न हैं गुजरे जमाने की
दिलचस्प कहानियाँ
फेफड़ों की तहर फैला है
हरा भरा सिटी फ़ॉरेस्ट
जहाँ पेड़ो पर कुहकती हैं कोयलें
तालाब में तैरती हैं बतखें
और सैकड़ों रंगों के फूलों पर
इठलाती हैं हज़ार रंग तितलियाँ
ये जो शहर है
ये मेरा शहर है।
पूरे संग्रह की कवितायें गवाह हैं कि कवि के मन का मृगछौना वर्तमान में जीता जरूर है लेकिन वो अपने पुरातन शाश्वत मूल्यों को जो हमारी आत्मा में बसते हैं, हमारी विरासतों जीवन दर्शन जो विश्व की सबसे पुरानी समृद्ध धरोहर है, हमारी पारिवारिक व्यवस्था जो सबसे मनोहारी व्यवस्था है जो धीरे-धीरे पटरी से उतरती जा रही है, कवि का मन वर्तमान में जीते हुए भी विगत के मनोहारी परिवेश से बाहर नहीं निकल पाता। यही तो है समृद्ध भारतीय जीवन मूल्यों, जीवन दर्शन और हमारी आध्यात्मिकता की विशेषता। प्रेम कविताओं की भी सुंदर स्मृतियों का वर्णन हैं
तुम्हारी आँखों की शान्त झील में
जब तैर जाता है सपनों का राजहंस
कंपकंपाते होंठ खुलते हैं
बुलाबी कमल की पंखुड़ियों से।
पूरे संग्रह की तमाम कवितायें पठनीय हैं। सामाजिक सरोकार की कवितायें हैं। मानसिक द्वन्द की कवितायें हैं। कवि ने माध्यम खुद को बनाया है और वेदना पूरे समाज की अभिव्यक्त हुई है। भाषा की सहजता पाठक को विषय से जोड़ती भी है और आकर्षित भी करती है। कवि प्रवीण साहित्य की उज्जवल सम्भावना वाले कुशल शब्द चितेरे हैं। संग्रह का भरपूर स्वागत होगा।
समीक्षा: कृष्ण भारतीय


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