डॉ. विद्या भूषण श्रीवास्तव
राष्ट्रीय जनमोर्चा, छपरा कार्यालय।
नवरात्र में करीब-करीब हर तरफ देवी गीत सुनने को मिल जाता है। खासकर इस भोजपुरी ‘पचरा’ लोगों को बहुत कर्णप्रिय लगता है। भोजपुरी देवी गीतों में पचरा एक ऐसी विधा है जिसमें माता के साथ भक्त का सीधा संवाद होता है। ऐसा माना जाता है कि पांच चरणों अथवा पांच छंदों में गाए जाने के कारण पचरा प्रसिद्ध है। भक्त पचरा गाकर देवी मां को प्रसन्न कर सकता है। प्रसिद्ध लोक गायिका मनीषा श्रीवास्तव ने ‘राष्ट्रीय जनमोर्चा’ से एक मुलाकात में देवी गीतों को लेकर विस्तार से चर्चा की।
मनीषा श्रीवास्तव के अनुसार, पचरा में एक भक्त देवी माँ से सीधा संवाद करता है। जबकि अन्य देवी गीतों में मां के सिर्फ गुणों एवं रूप का वर्णन होता है, तो वहीं मां से कुछ मांगने व जीवन में अच्छा करने की कामना होती है। भोजपुरी प्रदेश में चैत्र नवरात्र या कुआर का नवरात्र हो या फिर कोई धार्मक अनुष्ठान, सभी में पचरा से माता का आह्वान होता है। ऐसी मान्यता है कि पचरा सुनने के बाद माता का उस देवघर में आगमन होता है।
पचरा की शुरुआत एवं ऐतिहासिक मान्यता :
पचरा गीतों की शुरुआत कब हुई, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन इसकी जड़ें भोजपुरी लोक संस्कृति से जुड़ी हुई है। चूंकि सनातन धर्म में हर तरह के देवी देवता की पूजा की जाती है, जिसमें दुर्गा, काली, शीतला माता आदि की पूजा लोक में ज्यादा होती है और भोजपुरी का थाति उसकी लोकसंस्कृति है। वैसे दूसरे ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो सिंधु घाटी सभ्यता से अपने भारत वर्ष में देवी पूजा का प्रचलन बढ़ा हुआ दिखता है। भक्ति आंदोलन के समय लोक में पचरा का प्रभाव ज्यादा बढ़ा और यह लोकगीत के रूप में लोकमानस में रच-बस गया।
कब गाया जाता है पचरा :
पचरा गाने का प्रचलन आम तौर पर चैत्र नवरात्र एवं कुआर के नवरात्र में अधिक है। लोग पचरा गाकर मां दुर्गा का आह्वान करते हैं। इसके अलावा पचरा किसी भी धार्मिक आयोजन या ग्रामीण क्षेत्रों में लगने वाले मेला व उत्सवों अथवा गाँव के काली पूजा में गाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पचरा सुनकर माँ का आगमन होता है जिससे सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान सफल हो जाते हैं।
पचरा गीत कई बार बीमारी से बचाव के लिए भी गाया जाता है। तमाम गाँवों में आज भी जब चेचक (ग्रामीण परिवेश में माता जी कहा जाता है) निकल आती है तो महिलाएँ दवा के साथ-साथ गाँव के काली मन्दिर या अपने घर में स्थित पूजा घर में शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पचरा गाती हैं। चिकनपॉस जब ठीक हो जाता है तो लोग मानते हैं कि पचरा से देवी ने खुश होकर अपना प्रकोप हटा लिया और रोगी ठीक हो गया।
पचरा का वर्तमान स्वरूप :
मनीषा मानती हैं कि आम तौर पर पचरा सामूहिक गायन शैली का परिचायक है। इसमें ढोल-मजीरा जैसे पारम्परिक वाद्ययंत्र बजा कर सामूहिक आह्वान किया जाता रहा है। इन वाद्ययंत्रों के साथ गाने से अपना लोक संस्कृति और लोकपरम्परा बचा रहता था। परंतु जब से बाजार ने लोक पर अपना प्रभाव डाला है, तब से पाश्चात्य संगीत का समावेश हो चुका है। इसके बावजूद पचरा की मिठास और पचरा द्वारा देवी मां और भक्त के बीच का संवाद बना हुआ है।


Leave a Reply