– शरद चन्द्र
पड़ने लगी फुहार जोरों से बौछार बनकर।
नव पल्लव, नीम झूमें पशु विह्वल उड़े खग चहककर।
मेरे अन्तर्मन में अभिलाषाओं के ज्वार उठे,
कैसे ये बारिश में भीग-भीग प्रकृति से मृदुता पाएं।
मन झूम उठा तरुओं को खुशियों से झूमते देख,
गलियों में बहती धाराएं धरा पर खींच रेख।
जीवन के मेरे राग विराग भी कुछ पल को अलग मुझसे हुए,
हृदय में सुंदरता छाई, आच्छादित हो नव भाव लिए।
बारिश की बूंदें टपक-टपक मन को आह्लादित करती हैं,
नदियां भी कल-कल करती ऐसे बहती जैसे वो सुअवसर खोज रहीं थीं;
कब बारिश हो धारायें मेरी नव गीत सुनायें तब,
टप-टप कर चूने लगे छप्पर के ओरी से पानी।
हे वर्षा ऋतु तेरा ये दृश्य बड़ा मनभावन है
पर बाधक भी है उनको जिनके घरों में घुस रहा पानी।
डूबे सोफे, डूबी गाड़ियां जैसे न बचा कोई सानी।।
(लेखक गौतमबुद्ध नगर के वरिष्ठ साहित्यकार हैंं।)


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